किला तलहटी में उरवाई गेट के नजदीक दहाड़ती मुद्रा में खड़े हैं वनराज सहित अनेक वन्य जीव...
कचरे के ढेर से "वंडरलैंड" तक के सफर की,ग्वालियर सफारी की अनूठी कहानी !
ग्वालियर। ऐतिहासिक ग्वालियर दुर्ग की तलहटी में दहाड़ती मुद्रा में खड़े वनराज शेर तो बड़े-बड़े दांतों के साथ जबड़ा खोले डायनासोर व लपकता सा मगरमच्छ । धीर गंभीर कछुआ तो शरारती मुद्रा में भालू व चिंपांजी। चलने को तैयार रेगिस्तान के जहाज यानि ऊँट व मदमस्त विशालकाय गजराज। शांत मुद्रा में पैंगुइन परिवार की मस्ती तो सतरंगी पंख फैलाकर मनभावन नृत्य करता राष्ट्रीय पक्षी मोर। यह किसी हॉलीवुड या बॉलीवुड फिल्म का दृश्य नहीं, ग्वालियर नगर निगम का अभिनव नवाचार “ग्वालियर सफारी – वेस्ट टू वंडर” है। जिसने कबाड़ को कल्पना, कला और पर्यावरण संरक्षण के अद्भुत संगम में बदल दिया है। इस अनूठी आर्टिफिशियल स्क्रैप जंगल सफारी में दुर्लभ और विलुप्त हो चुके जीव-जंतु कबाड़ से जीवंत होकर खड़े हैं और हर आने वाले को हैरान कर देते हैं।
ग्वालियर किले की तलहटी में सफारी के रूप में हुए प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप किए गए इस सफल नवाचार की सफलता की गवाही, पहले-बाद की तस्वीरें खुद देती हैं। जहां कभी मलबे के ढेर, अस्त-व्यस्त झौंपड़ियां और उजाड़ जमीन नजर आती थी, वहां अब हरे-भरे घुमावदार रास्ते, शाम ढलते ही रोशनी से जगमगाती फिजा और सैलानियों की रौनक दिखाई देती है। आज यह जगह ग्वालियर की शान बन चुकी है। नाम है "ग्वालियर सफारी - वेस्ट टू वंडर"।
किले के साये में कबाड़ से कला तक का सफर
नगर निगम के कबाड़ खाने में वर्षों से बेकार पड़े लगभग 150 टन से अधिक स्क्रैब लोहे को नया जीवन देकर किला तलहटी में 2.5 एकड़ में यह सफारी तैयार की गई है। कलाकारों ने कबाड़ से ऐसे विशालकाय वन्य जीवों के शिल्प गढ़े हैं, जिन्हें देखकर पहली नजर में विश्वास ही नहीं होता है कि ये लोहे के बेकार टुकड़ों से बने हैं। इस सफारी में सबसे बड़ी खासियत है वन्य जीवों की 14 विशाल स्कल्पचर (मूर्तियां) । हर मूर्ति इतनी बारीकी से गढ़ी गई है कि दूर से देखने पर असली जानवर होने का भ्रम होता है। सर्कुलर इकॉनमी की इस जीती-जागती मिसाल ने कचरे को चमत्कार में बदल दिया है।
जहां पत्थर भी हरे हो गए
सिर्फ मूर्तियां ही नहीं, इस जमीन की मिट्टी भी बदल गई है। सफारी परिसर में 600 से अधिक स्थानीय प्रजाति के पेड़ रोपे गए हैं। साथ ही जंगल जैसा आभास कराने के लिये करीब 3,000 झाड़ियां-पौधे भी लगाए गए हैं। सफारी की दीवारों पर लहराती बोगनवेलिया ने इस जगह में अलग ही रंग भर दिए हैं तो लैंडस्केप आर्किटेक्ट्स की सूझबूझ ने हर मोड़ को कुछ इस तरह गढ़ा है कि यहां घूमते हुए किसी असली सफारी में होने का एहसास होता है। हरियाली और स्क्रैप कला का यह संगम आगुंतकों को प्रकृति के और करीब ले जाता है।
आकर्षण भी, आने वाली पीढ़ी की जागरूकता भी और आमदनी भी
सफारी में स्थापित शेर, हाथी, गेंडा, जिराफ, डायनासोर एवं अन्य दुर्लभ वन्य जीवों के विशाल स्कल्पचर इतनी बारीकी और वास्तविकता के साथ बनाए गए हैं कि हर आगुंतक छिटककर उन्हें अपने कैमरे में कैद करना चाहता है। यह स्थान अब केवल घूमने की जगह भर नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण और री-साइकलिंग का जीवंत संदेश देने वाला “ईको-कल्चर डेस्टीनेशन” बन चुका है। अब तक इस सफारी ने सिर्फ प्रवेश टिकटों के जरिए नगर निगम के खजाने में करीब 10 लाख रुपये जमा किए हैं। यानि एक उपेक्षित जमीन अब कमाई का जरिया भी बन चुकी है।
रोजाना औसतन 150 से ज्यादा पर्यटक यहां का रुख करते हैं। वीकेंड पर सैलानियों की भीड़ 500 के पार पहुंच जाती है, जो इसकी बढ़ती लोकप्रियता की गवाह है। दिल छू लेने वाली बात यह है कि शहर और आसपास के सरकारी-निजी स्कूलों के 8,000 से ज्यादा नन्हे विद्यार्थी अब तक इस सफारी में मौज मस्ती व अपना ज्ञानवर्धन करने आ चुके हैं।फिलहाल यहां एक कैंटीन बनाने की योजना पर काम चल रहा है। जाहिर है इस प्रकार की सुविधायें बढ़ने से पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और निगम की आमदनी भी।
सकारात्मक संदेश भी दे रही है सफारी
"ग्वालियर सफारी - वेस्ट टू वंडर" सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि यह एक संदेश भी है कि इच्छाशक्ति हो तो कचरा भी कला बन सकता है। साथ ही उपेक्षित जमीन शहर की शान बन सकती है। टिकाऊ शहरी विकास, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक गौरव का यह जीवंत उदाहरण आज ग्वालियर की पहचान बनकर उभरा है। साथ ही देशभर के शहरों के लिए एक प्रेरणा भी।



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