”आगे-आगे देखो, दतिया की सियासत में अभी बहुत पानी बहनो बाकी है...
दतिया में दद्दा की लुटिया डूबी,अब सिपहसालारन की बारी !
दतिया। दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद भीतरघात की चर्चाएं चलीं, नाराजी के सुर उठे और पुराने पावर सेंटर की पकड़ पर सवाल खड़े हुए। अब हालात ऐसे हैं कि “जिनके आंगन में कल तक दरबार लगत थौ, आज उन्हीं के डेरे उखड़त दिख रए हैं।”
बुंदेलखंड में कहत हैं,“जै दिन फिरत हैं, तै दिन चकरी भी उलटी घूमत है।” दतिया की सियासत में इन दिनन कुछ ऐसोई नजर आ रओ है। कल तलक जिनकी “हां में हां” मिलावे बिना पत्ता नईं हिलत थौ, आज उन्हीं के इर्द-गिर्द प्रशासन का डंडा घूम रओ है। सरकारी आवास खाली करावे की कार्रवाई को प्रशासन भले नियम-कायदे की कार्रवाई बता रओ हो, पर दतिया की सियासत में सवाल तो उठबे कर रओ है—“बाबा, अबै तक नींद में रहो काय?”
बुंदेली में एक बात और है—“राजा बदलत देर नईं लगत, पर दरबारियन के रंग बदलते देर नईं लगत।” सो दतिया में भी रंग बदल रओ है या केवल सरकारी कार्रवाई हो रई है, इसका फैसला वक्त करैगो। फिलहाल इतना जरूर समझ लोसियासत में कुर्सी स्थायी नईं, और पावर का पहाड़ भी एक दिन ढलान पकड़त है।
दद्दा चुनावी रण में पटखनी खा गए, अब उनके आसपास के पुराने सिपहसालारन पर कार्रवाई हुई तो सियासी गलियारन में फुसफुसाहट स्वाभाविक है। काहे कि बुंदेलखंड में कहावत है,“जब नाव में छेद होय, तो पहिले पानी भीतर आवत है, बाद में नाव डूबत है।”
अब दतिया की जनता बस तमाशा देख रई है,“कौन बचत है, कौन बहत है… और सत्ता की अगली लहर कउनके किनारे लगत है।”आगे-आगे देखो, दतिया की सियासत में अभी बहुत पानी बहनो बाकी है।



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