सलाखों के पीछे गए भाई के प्रति,बहनों ने अटूट प्रेम की एक नई इबारत लिखी ...
ग्वालियर चंबल की जेलों में 'भाईदूज' के अवसर पर भाई-बहन के रिश्तों ने माहौल को भावुक बना दिया !
ग्वालियर। इंसान जब अपराध करने लगता है या जाने अनजाने उस से कोई अपराध हो जाता है तो समाज से वह अलग-थलग पड़ जाता है ! लेकिन संस्कार और रिश्ते उसे वापस मुख्यधारा में खींचने की ताकत रखते हैं। कुछ ऐसा ही मंजर गुरूवार को भाई दूज के अवसर पर ग्वालियर और चंबल संभाग की जेलों में देखने को मिला। होली के उल्लास के बाद जब पूरा देश भाईदूज का पर्व मना रहा था, तब ग्वालियर केंद्रीय जेल सहित संभाग की अन्य जेलों की लोहे की सलाखों के पीछे भाई-बहन के अटूट प्रेम की एक नई इबारत लिखी गई।
सुबह से ही उमड़ा बहनों का सैलाब गुरुवार की अलसुबह से ही केंद्रीय जेल ग्वालियर के बाहर रंग-बिरंगी साड़ियों और हाथों में तिलक की थाली लिए बहनों का तांता लगना शुरू हो गया था। जेल प्रशासन की कड़ी सुरक्षा और चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच, जैसे ही मुलाकातों का दौर शुरू हुआ, जेल परिसर के भीतर का माहौल पूरी तरह बदल गया। अपनी सजा काट रहे भाइयों के माथे पर जब बहनों ने कुमकुम और अक्षत का टीका लगाया, तो कई आंखें नम हो गईं।
आंकड़ों में स्नेह का पैमाना ग्वालियर केंद्रीय जेल के अधीक्षक श्री विदित सिरवैया के अनुसार, केवल ग्वालियर जेल में ही लगभग 2400 बंदियों ने अपनी बहनों से मुलाकात की। अगर पूरे संभाग की बात करें, तो आंकड़े बताते हैं कि इस विशेष अवसर पर कुल 3343 बंदियों से मिलने के लिए 9413 महिलाएं और बच्चे जेल की दहलीज तक पहुंचे।
संभाग की अन्य जेलों में भी स्नेह का यही प्रवाह देखने को मिला। मुरैना जिला जेल में जहाँ 745 बहनें अपने 265 भाइयों को तिलक लगाने पहुंचीं, वहीं दतिया में 307 बहनों ने भाइयों की लंबी उम्र की कामना की। इसके अलावा डबरा, अम्बाह, लहार, मेहगांव, गोहद, जौरा और सबलगढ़ जैसी उप-जेलों में भी भारी संख्या में परिजन जुटे। छोटी उप-जेलों जैसे विजयपुर और सेंवढ़ा में भी प्रशासन ने मुलाकातों के लिए सुगम व्यवस्था सुनिश्चित की।
प्रशासनिक तालमेल की मिसाल इतनी बड़ी संख्या में उमड़ी भीड़ को संभालना जेल प्रशासन के लिए एक चुनौती थी, लेकिन जिला प्रशासन, पुलिस बल और नगर निगम के आपसी सहयोग ने इस कार्य को बेहद गरिमापूर्ण बना दिया। सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि हर बहन अपने भाई तक पहुंच सके और शांतिपूर्वक अपनी परंपरा निभा सके।
जेल की चहारदीवारी के भीतर मनाई गई यह भाईदूज महज एक रस्म नहीं थी, बल्कि बंदियों के लिए यह एक मानसिक सम्बल और समाज में वापस लौटने की एक उम्मीद भी थी। तिलक लगाकर और मिठाई खिलाकर बहनों ने भाइयों से अपराध का रास्ता छोड़कर एक बेहतर इंसान बनने का मौन वादा भी लिया।










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