जो अवशेष हमारी श्रद्धा के केंद्र हैं, श्रीलंका और दूसरे पड़ोसी देशों में उनके प्रति प्रति अटूट आस्था ...
चीन को नहीं लगी भनक और अनमोल निशानी के जरिए भारत ने पकड़ी डिप्लोमेसी की उड़ान !
चीन को भनक लग गई होगी कि हाल के वर्षों में विशेष विमानों में भगवान बुद्ध के अवशेष के साथ भारतीय डिप्लोमेसी ने भी नई उड़ान पकड़ी है. ऐसी उड़ान, जो सदियों पुराने संबंधों को फिर से मजबूत करेगी और बुद्ध को मानने वाले पड़ोसियों को भारत के करीब लाएगी. अब प्लेन कोलंबो गया है.
देवनीमोरी गुजरात में एक स्थान है, जहां पर भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष प्राप्त हुए हैं. उस पर लंबा रिसर्च हुआ और जानकारी मिली कि ये वास्तव में सही और तथ्यपूर्ण हैं. इसे बड़ौदा की यूनिवर्सिटी में स्थापित किया गया. पिछले दिनों पीएम नरेंद्र मोदी श्रीलंका गए तो उन्होंने इन अवशेषों का जिक्र किया था. गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने बताया है कि भगवान बुद्ध की शिक्षाएं प्राणी मात्र और समस्त विश्व की शांति, कल्याण, करुणा और दया के भाव पर टिकी हैं.
श्रीलंका में भगवान बुद्ध के प्रति अटूट आस्था रखने वाली प्रजा है, तो पीएम का ऐसा चिंतन था कि ये जो अवशेष हमारी श्रद्धा के केंद्र हैं, श्रीलंका और दूसरे पड़ोसी देशों में भी जाएं. उसी मिशन को लेकर भारत से एक शिष्टमंडल श्रीलंका पहुंचा हुआ है. भारतीय वायुसेना के विशेष विमान में गवर्नर देवव्रत के साथ गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष सांघवी भी कोलंबो गए हैं. ऐसे समय में पीएम की वो बात भी दुनिया को याद करनी चाहिए जब उन्होंने कहा था- यह युद्ध नहीं, बुद्ध का युग है. अब अपनी अमूल्य निशानी के जरिए भारत ने डिप्लोमेसी को नई उड़ान दी है.
दरअसल, भगवान बुद्ध का जब देहावसान हुआ तब उनकी अस्थि-अवशेषों को आठ हिस्सों में बांटा गया. सात हिस्से उनके सात परम शिष्य तत्कालीन भारत के अपने-अपने प्रांत में लेकर चले गए थे. जो आठवां हिस्सा था, वो भगवान बुद्ध के शाक्य परिवार (कपिलवस्तु) को दिया गया. जमीन के 18 फीट नीचे वर्षों पहले खुदाई के दौरान मिले विशाल पत्थर के संदूक में सहेजे गए भगवान बुद्ध के पावन अस्थि अवशेष के आज दर्शन किए जा सकते हैं. ये अवशेष रत्नों और आभूषणों के साथ विभिन्न आकार के 3 कैसकैट (कलश) में सुरक्षित रखे गए थे.
अब भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष भारतीय वायुसेना के विशेष C-130J विमान से कोलंबो पहुंचाए गए हैं. यह उनकी पहली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी है. यह श्रीलंका के लिए गौरव की बात है. पवित्र अवशेषों को गंगारामया मंदिर में आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा गया है.
भारत का सोचा समझा कदम
भारत के सबसे पवित्र बौद्ध खजानों में से यह एक है. भारत में श्रीलंका की राजदूत महिषिनी कोलोन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह श्रीलंका के लिए एक अनोखा आशीर्वाद है. वास्तव में एक ऐसे देश के लिए जहां बौद्ध धर्म राष्ट्रीय पहचान, राजनीति और रोजमर्रा की जिंदगी में रचा बसा हुआ है, यह प्रदर्शनी इंडियन डिप्लोमेसी का एक सोचा-समझा कदम है. हां, हाल के वर्षों में पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे, उसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं लेकिन अब भारत ने बड़ा कदम उठाया है.
बौद्ध संस्कृति की जड़ें श्रीलंका में हैं इसलिए यह प्रदर्शनी एक दोनों देशों के बीच प्रांचीन बंधन को और मजबूत करेंगी. भारत ने कोलंबो के साथ अपने जुड़ाव में इस साझी विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. देवनीमोरी अवशेष गुजरात के अरावली जिले में एक आर्कियोलॉजिकल साइट से मिले हैं. 1950 के दशक के आखिर में खुदाई के दौरान यहां एक प्राचीन बौद्ध स्तूप मिला था. पूजा की चीजों में बुद्ध के शरीर के अवशेष भी मिले.
दिल्ली में बौद्ध समिट के बाद नई उड़ान
- - हां, भारत से भगवान बुद्ध के अवशेष का श्रीलंका भेजे जाने की टाइमिंग अहम है. नई दिल्ली में ग्लोबल बौद्ध समिट (24-25 जनवरी) आयोजित करने के कुछ दिन बाद विशेष विमान कोलंबा के लिए रवाना हुआ.
- - यहीं नहीं, भारत ने अपने नेशनल बजट में अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में बौद्ध स्थलों के बड़े डेवलपमेंट प्रोग्राम के प्लान की भी घोषणा की.
- - यह प्रदर्शनी सॉफ्ट पावर के एक पावरफुल टूल के तौर पर काम करती है. यह लोगों के बीच गहरे कनेक्शन को बढ़ावा देती है, भरोसा बढ़ाती है. इसके साथ-साथ गहरे सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव के साथ औपचारिक डिप्लोमेटिक कनेक्शन को भी मजबूत करेगी.
- - इससे वैश्विक बौद्ध विरासत के एक जिम्मेदार कस्टोडियन के तौर पर भारत की भूमिका को पहचान मिल रही है. हिंद महासागर के पड़ोस में क्षेत्रीय सद्भाव बढ़ रहा है और दोनों देशों के रिश्तों को बढ़ाता है.
संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने दूसरे वैश्विक बौद्ध सम्मेलन में भारत को बौद्ध की शिक्षाओं का कस्टोडियन बताया था, जो पुरानी परंपराओं को आज की ग्लोबल चुनौतियों से जोड़ता है. यह मैसेज पूरे एशिया में सभ्यतागत लिंक को फिर से तैयार करने और बौद्ध डिप्लोमेसी को सॉफ्ट पावर के सोर्स के तौर पर इस्तेमाल करने की एक दशक पुरानी स्ट्रैटजी को दिखाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अक्सर बुद्ध के साथ एक पर्सनल और स्पिरिचुअल कनेक्शन पर जोर देते रहे हैं.उनका जन्मस्थान वडनगर बौद्ध शिक्षा का एक पुराना केंद्र रहा है.
बाहरी पहलू भी है
हां, भारत की इस रणनीति का एक स्पष्ट बाहरी पहलू भी है. वो चीन है. बीजिंग ने अपनी बौद्ध विरासत को दिखाने में बहुत फोकस किया है. मंदिरों, शिक्षण संस्थानों और धार्मिक आदान-प्रदान को अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल किया है. अपने नास्तिक पॉलिटिकल सिस्टम के बावजूद चीन ने एशिया में खुद को बौद्ध धर्म का कल्चरल सेंटर बनाने की कोशिश की है. अब भारत बड़ी शांति से अपनी ऐतिहासिक निशानियों को पड़ोसी देशों तक पहुंचा रहा है. वैसे भी बौद्ध सम्मेलनों में दलाई लामा को देखकर चीन बिलबिलाता रहा है.
आपको याद होगा भारत ने पिछले साल नवंबर में बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेष को 17 दिन की प्रदर्शनी के लिए भूटान भेजा था. 2024 में भारत ने इन निशानियों को 26 दिन की प्रदर्शनी के लिए थाईलैंड भेजा था. अगले साल नेपाल बॉर्डर पर मिले पिपरहवा बौद्ध अवशेषों को हॉन्ग कॉन्ग से वापस लाया गया. यह 127 साल बाद घर वापसी का महत्वपूर्ण घटनाक्रम रहा.










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