G News 24 : फुल वॉल्यूम में आस्था या फुल वॉल्यूम में अराजकता !

 एक जरूरी सवाल,एक जरूरी बहस...

फुल वॉल्यूम में आस्था या फुल वॉल्यूम में अराजकता !

कृत्य ऐसा कि मानो आराध्य को नहीं, बल्कि पड़ोसी को प्रभावित करना लक्ष्य !

आस्था मन को शांति देती है, समाज को जोड़ती है और व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाती है। लेकिन जब वही आस्था दूसरों के लिए मानसिक पीड़ा, अनिद्रा और बीमारी का कारण बन जाए, तब सवाल सिर्फ शोर का नहीं, सोच का भी हो जाता है।

आज देश के अनेक हिस्सों में इबादत/ पूजा के नाम पर लाउडस्पीकरों की होड़ लगी हुई है। कौन ज़्यादा तेज़, कौन ज़्यादा देर तक ! मानो आराध्य को नहीं, बल्कि पड़ोसी को प्रभावित करना लक्ष्य बन गया हो। हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय स्पष्ट मानकों के बावजूद न तो लाउडस्पीकरों की संख्या घट रही है, न ही उनका वॉल्यूम।

आस्था की आड़ में असंवेदनशीलता...

इस शोर का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतते हैं,नौकरीपेशा लोग, बीमार, बुज़ुर्ग और विद्यार्थी। जो व्यक्ति पूरी रात ड्यूटी करके लौटा हो, जो रोगी दर्द में हो, या जो छात्र देर रात तक पढ़ाई करता हो, उनके लिए अलसुबह फुल वॉल्यूम में गूंजती ध्वनि किसी यातना से कम नहीं। नींद केवल सुविधा नहीं, स्वास्थ्य और मानव अधिकार है।

इबादत/आराधना  का अर्थ शांति है, प्रदर्शन नहीं...

  • जरा ठहरकर सोचिए...क्या सचमुच मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च, मस्जिद या ईदगाह में ईश्वर को याद करने के लिए इतनी तीव्र ध्वनि आवश्यक है ?
  • क्या भक्ति का मापदंड डेसिबल में तय होता है?
  • पूजा या इबादत का मूल अर्थ है,अपने आराध्य से संवाद, आत्मचिंतन और विनम्रता।
  • दूसरों को परेशान करके न तो ईश्वर प्रसन्न होते हैं, न ही कोई आराधना स्वीकार होती है।
  • एक निर्णय और लीजिए और उसका विरोध कीजिये जहां से शोर ज्यादा आये उसकी अपने स्तर पर शासन-प्रशासन को कीजिए 

प्रशासन की चुप्पी,समस्या को न्योता...

  • यह और भी गंभीर तब हो जाता है जब यह सब जानबूझकर, बार-बार और मनमाने ढंग से किया जाए और शासन-प्रशासन मूकदर्शक बना रहे।
  • कानून मौजूद है, निर्देश मौजूद हैं, फिर भी कार्रवाई का अभाव यह संदेश देता है कि नियम सिर्फ कागज़ों के लिए हैं।
  • अगर कोई संस्था या स्थान लगातार ध्वनि मानकों का उल्लंघन कर रहा है, तो सख्त कार्रवाई न करना भी एक तरह की जिम्मेदारी से पलायन है।

आस्था बनाम असहिष्णुता

फैसला हमें करना है...

यह किसी एक धर्म या समुदाय का सवाल नहीं है। यह सार्वजनिक जीवन,आपसी सम्मान और संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न है।

आस्था निजी हो सकती है, लेकिन शोर सार्वजनिक होता है और सार्वजनिक असुविधा पर चुप्पी भी अपराध के समान है। समय आ गया है कि सच्चाई को हम सब यह स्वीकार करें !

  •  दूसरों को कष्ट देकर अपने इष्ट को मनाया नहीं जा सकता।
  • शांति में की गई प्रार्थना ही सच्ची प्रार्थना है।

अगर आज हमने शोर को आस्था मान लिया, तो कल असहिष्णुता को भी भक्ति का नाम दे दिया जाएगा। और तब न आस्था बचेगी, न शांति।

— यही चेतावनी है, और  यही आग्रह...

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