भारत में DPDP का पहरा,जानें क्या कहता है हमारा कानून ...
आज के इस डिजिटल दौर में पहचान ही सबसे बड़ी पूंजी,US में इस 'डिजिटल गुलामी' ने उड़ाए होश !
आज के इस डिजिटल दौर में पहचान ही सबसे बड़ी पूंजी बन गई है. एक क्लिक में आपकी फोटो, आवाज और वीडियो दुनियाभर में पहुंच सकता है. यही अब नया कानूनी विवाद भी बनता जा रहा है. अमेरिका के नेवादा में महिलाओं ने आरोप लगाया है कि नौकरी छोड़ने के बाद भी उनकी डिजिटल पहचान कंपनी इस्तेमाल कर सकती है. ऐसे में सवाल अब सिर्फ अमेरिका का नहीं, भारत का भी है क्या भारत में आपका चेहरा सुरक्षित है...
DPDP Act India: जरा सोचिए आपने आज एक कंपनी छोड़ी और 5 साल बाद आप किसी बड़े प्रतिष्ठित पद पर काम कर रहे हैं, लेकिन अचानक आपको पता चलता है कि आपका चेहरा किसी आपत्तिजनक विज्ञापन या AI वेबसाइट पर चमक रहा है! क्योंकि आपने सालों पहले एक Royalty-free एग्रीमेंट साइन किया था. यह कोई फिल्म की कहानी नहीं बल्कि अमेरिका के नेवादा राज्य में काम करने वाली महिलाओं का सबसे बड़ा डर है.
क्या कोई कंपनी आपके काम छोड़ने के बाद भी आपके चेहरे और आवाज का इस्तेमाल ऐड या फिर AI मॉडल बनाने के लिए कर सकती है? अमेरिका के नेवादा राज्य के एक फेमस ब्रोथल शेरीज रेंच में काम करने वाली महिलाओं ने इसी डिजिटल खतरे के खिलाफ आवाज उठाई है. एक वर्कर्स ने खुलासा किया है कि कंपनियां अब ऐसे खतरनाक कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करवा रही है जिससे आप अपनी ही फोटो और आवाज पर अपना हक खो देंगे. अपनी प्राइवेसी और डिजिटल अधिकारों को बचाने के लिए इन महिलाओं ने अब यूनियन का रास्ता चुना है.
क्या है पूरा विवाद?
आपकी जानकारी के लिए बता दे कि नेवादा अमेरिका का एकमात्र राज्य है जहां कानूनी रूप से देह व्यापार लीगल है. यहां की सेक्स वर्कर्स जिन्हें यहां कोर्टिसन्स कहते हैं अब देश की पहली ऐसी यूनियन बनाने की तैयारी में हैं जिसे कानूनी मान्यता मिले. मामला तब शुरू हुआ जब दिसंबर में मैनेजमेंट ने एक नया इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर एग्रीमेंट लाया.
AI और डेटा प्राइवेसी का बड़ा खतरा
यूनियन की मेंबर ने खुलासा किया है कि नए कॉन्ट्रैक्ट के तहत कंपनी के पास वर्कर्स की इमेज और वीडियो के इस्तेमाल का लाइफटाइम अधिकार होगा. उन्होंने बताया कि इस कॉन्ट्रैक्ट का मतलब है कि आप बिना मर्जी किसी जापानी लुब्रिकेंट कंपनी का चेहरा बन सकते हैं या आपकी फोटो किसी AI कंपैनियनशिप वेबसाइट पर इस्तेमाल की जा सकती है और इसके लिए आपको पैसे भी नहीं मिलेंगे.
वर्कर्स की क्या है मांगें
वर्कर्स का कहना है कि वे खुद अपना ऑनलाइन कंटेंट बनाती हैं जिस पर सिर्फ उन्हीं का हक होना चाहिए.
अभी तक उन्हें फ्रीलांसर के तरह ही माना जाता है लेकिन उनसे काम कर्मचारी यानी फुल टाइन फिक्स्ड शेड्यूल के साथ लिया जाता है.
वर्कर्स का कहना है कि अगर उनकी पहचान डिजिटल दुनिया में हमेशा के लिए कंपनी के पास गिरवी रहेगी तो वे भविष्य में कोई दूसरा करियर नहीं अपना पाएंगी.
यूनियन का मिला साथ
यह लड़ाई अब कम्युनिकेशंस वर्कर्स ऑफ अमेरिका यानी CWA लड़ रही है. हालांकि इसको लेकर मैनेजमेंट ने दावा किया है कि वे सिर्फ एक सुरक्षित और कानूनी वातावरण दे रहे हैं. फिलहाल यह मामला नेशनल लेबर रिलेशंस बोर्ड के पास पहुंच गया है जिसका नतीजा आने वाले समय में गिग इकोनॉमी और डिजिटल राइट्स के लिए मिसाल बन सकता है.
क्या भारत के लिए भी खतरे की बात
ऐसे में अब लोगों के मन में यह सवाल आ रहा है कि क्या ऐसे खतरे भारत में भी हो सकते हैं? तो इसका जवाब है नहीं. भारत ने इस तरह के खतरों से लोगों को बचाने के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट यानी DPDP Act लाया गया है जो हमें ऐसे खतरों से बचाने का दावा करता है. नियम के अनुसार...
कोई भी कंपनी आपकी निजी जानकारी यानी फोटो-वीडियो का इस्तेमाल बिना सहमति के नहीं कर सकेंगे.
आपको अपनी सहमति वापस लेने का अधिकार है.लेकिन अगर आपने एग्रीमेंट के रूप में अपने अधिकार किसी कंपनी को दे दिए हैं तो इससे बचने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना पड़ सकता है.










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