GNews 24 : शेख हसीना की सत्ता उखाड़ फेंकने वाले स्टूडेंट लीडर्स की NCP चुनाव में में गिरी ओंधे मुंह !

 ‘क्रांति’ से ‘करारी हार’ तक ! 

शेख हसीना की सत्ता उखाड़ फेंकने वाले स्टूडेंट लीडर्स की NCP चुनाव में में गिरी ओंधे मुंह !

बांग्लादेश की राजनीति में 2024 का वो तूफान याद है न? जब छात्रों ने सड़कों पर उतरकर शेख हसीना की सत्ता को उखाड़ फेंका था. हिंसा एवं आगजनी के सहारे शेख हसीना को 2024 में उखाड़ फेंकने वाले छात्र लीडर्स की नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने पहली बार चुनाव लड़ा और 30 सीटों पर उतरकर महज 5-6 सीटें जीतीं है. NCP के नाहिद इस्लाम ने ढाका-11 जीती, लेकिन कुल मिलाकर BNP की पुरानी ताकत ने युवा पार्टी को पीछे छोड़ दिया है. 

शेख हसीना के खिलाफ चले छात्र आंदोलन से कई नए चेहरे उभरे.  इन्हीं छात्र नेताओं ने मिलकर नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (NCP) बनाई थी, जिसमें  दावा किया गया कि यह पार्टी “नई राजनीति” की शुरुआत करेगी और पुराने दलों को चुनौती देगी. नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) में नाहिद इस्लाम, हसनात अब्दुल्लाह ने अपनी हुंकार भरते हुए जमात-ए-इस्लामी के 11-पार्टी गठबंधन में शामिल हुए. 

12 फरवरी 2026 के चुनाव में करीब 30 सीटों पर दांव भी लगाया. उम्मीद थी कि युवा वोटर्स उन्हें अपने सिर आंखों पर बिठा लेंगे, लेकिन जब परिणाम आया तो सब पानी हो गया. छात्र आंदोलन के समय जिन नेताओं की छवि बेहद मजबूत थी. सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक उनकी पकड़ ऐसी दिख रही थी आने वाले दिनों के यही लोग हीरो हैं,  लेकिन जब बात चुनावी मैदान की आई, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आई.

चुनावी नतीजों में क्यों पिछड़ी NCP?

ताजा नतीजों में मुख्य मुकाबला (BNP) और सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच रहा. NCP ने कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन ज्यादातर जगहों पर उन्हें अपेक्षित वोट नहीं मिले. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आंदोलन और चुनावी राजनीति में फर्क होता है. आंदोलन में भावनाएं काम करती हैं, जबकि चुनाव में संगठन, बूथ मैनेजमेंट और संसाधन बड़ी भूमिका निभाते हैं. BNP के पास वर्षों पुराना मजबूत नेटवर्क है. स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय रहे. इसके मुकाबले NCP के पास जमीनी ढांचा सीमित था.

क्या BNP ने ‘कुचल’ दिया NCP को?

कुछ सीटों पर BNP उम्मीदवारों ने भारी अंतर से जीत दर्ज की. इससे यह चर्चा तेज हो गई कि क्या BNP ने NCP को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया? हालांकि, NCP नेताओं का कहना है कि यह उनकी पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी और वे इसे “शुरुआती कदम” मानते हैं. उनका दावा है कि पार्टी लंबी लड़ाई के लिए तैयार है और आने वाले स्थानीय चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करेगी.

जनता ने क्या संदेश दिया?

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, मतदाताओं ने इस बार स्थिरता और अनुभवी नेतृत्व को तरजीह दी. BNP के नेतृत्व में खासतौर पर Tarique Rahman की सक्रियता ने पार्टी को ऊर्जा दी. वहीं, NCP की सबसे बड़ी चुनौती थी भरोसे को वोट में बदलना. सोशल मीडिया पर लोकप्रियता को जमीनी वोट में बदल पाना आसान नहीं होता.

बांग्‍लादेश में बीएनपी की बम-बम

बांग्लादेश में अभी प्रोविजनल रिजल्ट्स के मुताबिक, BNP और उसके साथियों ने 211 सीटें जीत लीं है. यानी 300 सदस्यीय संसद में दो-तिहाई बहुमत से ज्यादा सीटें मिल चुकी हैं. तारिक रहमान अब पीएम बनने की तरफ बढ़ रहे हैं. उधर जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को 70 सीटें मिलीं, जो उनके लिए रिकॉर्ड है. लेकिन NCP? वो महज 5-6 सीटों पर अटक गई.

आगे की राह क्या?

NCP के सामने अब दो रास्ते हैंया तो संगठन को मजबूत कर धीरे-धीरे जमीन तैयार करे, या बड़े विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनकर अपनी मौजूदगी बचाए. चुनाव परिणामों पर शुरुआती रिपोर्ट्स स्थानीय मीडिया और चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से सामने आई हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह नतीजे बांग्लादेश की राजनीति में नए समीकरण तय करेंगे. कुछ जीतें तो धांसू रहीं. जिसमें नाहिद इस्लाम ने ढाका-11 से शपला कोली सिंबल पर भारी मतों से जीत हासिल की है. कुछ अन्य सीटों जैसे कुमिल्ला या कुरिग्राम में भी NCP के युवा चेहरे चमके हैं. कही जगह NCP की 6 सीटों की बात है, जबकि Reuters ने 5 बताई है. पार्टी ने कई जगह धांधली का रोना रोया है, रिकाउंट मांगा, लेकिन कुल असर नहीं पड़ा. ये चुनाव इसलिए खास था क्योंकि ये हसीना के बाद पहला बड़ा टेस्ट था.

BNP की आंधी में कुचली गई NCP

गठबंधन में जमात के साथ जाने से कई लिबरल युवा नाराज हुए, कुछ तो पार्टी छोड़कर भाग गए. NCP उतना नहीं चमक पाई जितना सोचा जा रहा था. फिर भी, 5-6 सीटें कोई छोटी बात नहीं. ये दिखाती हैं कि छात्र राजनीति अब मैदान में है, भले ही BNP की आंधी में कुचली गई लगे.आने वाले समय में NCP ऑपोजिशन में क्या कमाल दिखाती है, या गठबंधन तोड़कर नई राह चुनती है – ये देखना बाकी है.बांग्लादेश की राजनीति में जेन जेड की एंट्री हुई है, लेकिन पुरानी ताकतें अभी हावी हैं.


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