G News24: नेताओं की राजनीति अब जनसेवा नहीं, बल्कि अवसरवाद और वोट-बैंक साधने तक है सीमित !

 राजनीति का मूल उद्देश्य देश राज्य और नगर का विकास और सुरक्षा होना चाहिए लेकिन ...

नेताओं की राजनीति अब जनसेवा नहीं, बल्कि अवसरवाद और वोट-बैंक साधने तक है सीमित !

भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ राजनीति का मूल उद्देश्य देश राज्य और नगर का विकास और सुरक्षा पृष्ठभूमि में चला गया है, और केंद्र में आ गई है केवल कुर्सी, पद और सत्ता की भूख। अधिकतर नेताओं की राजनीति अब जनसेवा नहीं, बल्कि अवसरवाद और वोट-बैंक साधने तक सीमित हो चुकी है। यही कारण है कि जनता के वास्तविक मुद्दे रोज़गार, शिक्षा, सुरक्षा और विकास राजनीतिक विमर्श से गायब होते जा रहे हैं।

महाराष्ट्र इसका ताज़ा और चिंताजनक उदाहरण है। एक ऐसी पार्टी, जिसकी राजनीति खुलकर कम्युनल पहचान पर आधारित रही है, उसे भी विधान परिषद में उल्लेखनीय सीटें मिल जाती हैं। यह केवल किसी एक पार्टी की जीत नहीं, बल्कि मुख्यधारा की राजनीति की विफलता का प्रमाण है। जब राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल जनभावनाओं से कट जाते हैं, तब जनता विकल्प की तलाश में ऐसे दलों की ओर मुड़ती है, जो भावनाओं को भड़काने में माहिर होते हैं।

दूसरी ओर, हिंदुत्व का झंडा उठाने वाली शिवसेना, विशेषकर ठाकरे बंधुओं की राजनीति, आज स्वयं अपने ही बयानों के जाल में उलझकर दम तोड़ती दिख रही है। कभी हिंदू हितों की बात, तो कभी उसी आधार को कमजोर करने वाले बयान इस दोहरेपन ने उनके पारंपरिक मतदाता को भ्रमित और निराश किया है। नतीजा यह हुआ कि न तो वे कट्टर हिंदुत्व के विश्वसनीय प्रतिनिधि रह पाए और न ही उदार राजनीति के। राजनीति में यह स्पष्ट संदेश है कि विचारधारा में भ्रम और अवसरवादी बयानबाज़ी जनता को लंबे समय तक गुमराह नहीं कर सकती।

अब सबसे बड़ा प्रश्न मतदाता की भूमिका का है। लोकतंत्र में वोट केवल अधिकार नहीं, बल्कि देश की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा हथियार है। मतदाता यदि भावनाओं, जाति, धर्म या तात्कालिक लालच में आकर वोट देता है, तो सत्ता ऐसे हाथों में चली जाती है जिनके लिए देश गौण और कुर्सी सर्वोपरि होती है। आज समय आ गया है कि मतदाता यह सोचे कि

  • — देश की सुरक्षा किसके हाथों में सुरक्षित रहेगी?
  • — विकास का स्पष्ट रोडमैप किसके पास है?
  • — कौन दल और नेता राष्ट्रहित को दलहित से ऊपर रखता है?

लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नेता जवाबदेह हों और मतदाता जागरूक। यदि मतदाता अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेगा, तो खोखली राजनीति, उग्र बयानबाज़ी और सत्ता की सौदेबाज़ी यूँ ही लोकतंत्र को कमजोर करती रहेगी। अब फैसला जनता के हाथ में है वह भावनाओं की राजनीति को चुनेगी या विवेक, विकास और सुरक्षा के आधार पर अपना मत देगी-

-रामवीर यादव

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