नेताओं के लिए ‘कानून लागू करने’ का औज़ार नहीं, बल्कि ‘मनमानी करवाने’ का माध्यम बनी,सुरक्षा एजेंसियां
आदेश ऊपर से आता है,अमल नीचे होता है और बीच में कुचल दिया जाता है संविधान !
भारत का संविधान पुलिस और सभी सुरक्षा एजेंसियों को एक स्पष्ट दिशा देता है- कानून का राज स्थापित करना, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और किसी भी दबाव से परे रहकर निष्पक्षता से अपने दायित्वों का निर्वहन करना। केंद्र हो या राज्य, हर वर्दीधारी हाथ संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेता है। फिर सवाल उठता है कि वही एजेंसियां अक्सर अपने संवैधानिक कर्तव्यों से भटककर राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाओं की अनुगामी क्यों बन जाती हैं?
सच यह है कि सत्ता की नजदीकी कई बार सुरक्षा एजेंसियों को उनका मूल उद्देश्य भुला देती है। नेताओं के लिए ये संस्थाएं ‘कानून लागू करने’ का औज़ार नहीं, बल्कि ‘मनमानी करवाने’ का माध्यम बन जाती हैं। आदेश ऊपर से आता है, अमल नीचे होता है- और बीच में कुचल दिया जाता है संविधान। यही कारण है कि कई बार विरोध की आवाज़ें दबाई जाती हैं, असहमति को अपराध बना दिया जाता है और शक्ति-प्रदर्शन को प्रशासनिक कार्रवाई का जामा पहना दिया जाता है।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां केवल और केवल संविधान के अनुसार अपने दायित्व निभाएं...
यदि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां केवल और केवल संविधान के अनुसार अपने दायित्व निभाएं - न किसी नेता का डर, न किसी पद का लोभ - तो देश में सत्ता की मनमानी अपने आप सीमित हो जाएगी। कानून के सामने सब बराबर हों, यह सिद्धांत तभी जीवित रहता है जब उसे लागू करने वाले निर्भीक हों। दुर्भाग्यवश, व्यावहारिक राजनीति में यह निर्भीकता अक्सर तब ढह जाती है जब सत्ता का संकेत मिलता है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से संबंधित ताज़ा घटना...
हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल से जुड़ा एक विवादास्पद घटनाक्रम इसी चिंता को और गहरा करता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से संबंधित ताज़ा घटना जिसे लेकर सार्वजनिक विमर्श में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं - इस बात का उदाहरण बनती है कि कैसे सत्ता के इशारे पर सुरक्षा व्यवस्था की भूमिका सवालों के घेरे में आ जाती है। यदि राज्य की सुरक्षा एजेंसियां अपने सीमित, वैधानिक कर्तव्य तक ही रहतीं और किसी कथित कृत्य में साथ न देतीं, तो क्या कोई भी नेता इतनी दूर तक जा पाता? यही वह प्रश्न है जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरता है।
यह मुद्दा किसी एक राज्य, एक नेता या एक घटना तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है जिसमें संस्थागत स्वायत्तता धीरे-धीरे राजनीतिक अधीनता में बदलती जा रही है। लोकतंत्र का स्वास्थ्य मजबूत संस्थाओं पर निर्भर करता है-
ऐसी संस्थाएं जो सत्ता बदलने से न बदलें, जो आदेश नहीं बल्कि कानून सुनें...
आज आवश्यकता इस बात की है कि सुरक्षा एजेंसियां अपने संविधान-प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों को फिर से केंद्र में रखें। राजनीतिक नेतृत्व को भी यह समझना होगा कि संस्थाओं का दुरुपयोग तात्कालिक लाभ भले दे दे, पर दीर्घकाल में यह लोकतंत्र को कमजोर करता है। और अंततः, एक कमजोर लोकतंत्र में सत्ता भी सुरक्षित नहीं रहती।
संविधान सर्वोपरि है-नेतृत्व नहीं...
संविधान सर्वोपरि है-नेतृत्व नहीं, जब तक यह सत्य व्यवहार में नहीं उतरेगा, तब तक वर्दी पर लगा बैज नहीं, बल्कि उस पर पड़ती परछाइयाँ सवालों के घेरे में रहेंगी -रामवीर यादव









0 Comments