G News 24 : “जयकारों, मंदिर की घंटियों से नमाज़ में बाधा वाला तर्क,तो फिर मंदिर में नमाज़ पढ़ने का ढोंग क्यों !

धर्म,आस्था और सार्वजनिक व्यवस्था नॉरेटिव की राजनीति पर कुछ जरूरी सवाल...

 “जयकारों, मंदिर की घंटियों से नमाज़ में बाधा वाला तर्क,तो फिर मंदिर में नमाज़ पढ़ने का ढोंग क्यों !

भारत की आत्मा उसकी बहुलता में बसती है, यहाँ आस्था भी है, उत्सव भी और संवैधानिक मर्यादाएँ भी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जैसे ही रामनवमी की शोभायात्राएँ निकलती हैं, कुछ हलकों में यह तर्क उछाला जाने लगता है कि “जयकारों, मंदिर की घंटियों और भजनों से नमाज़ में बाधा उत्पन्न होती है” या इससे “धर्म भ्रष्ट” होता है। सवाल यह नहीं कि किसकी आस्था बड़ी है, सवाल यह है कि क्या आस्था के नाम पर सार्वजनिक व्यवस्था और परस्पर सम्मान को ताक पर रखा जा सकता है?

पहला बिंदु साफ है, रामनवमी जैसे पर्व हिंदू समाज की धार्मिक अभिव्यक्ति हैं। जय श्रीराम के उद्घोष, ढोल-नगाड़े और शोभायात्राएँ सदियों से भारतीय परंपरा का हिस्सा रही हैं। यदि हर सार्वजनिक धार्मिक गतिविधि को किसी एक समुदाय की धार्मिक क्रिया से टकराव के चश्मे से देखा जाएगा, तो फिर सार्वजनिक जीवन का साझा स्पेस ही समाप्त हो जाएगा। संविधान सभी को पूजा-पाठ की स्वतंत्रता देता है, लेकिन किसी एक की सुविधा के नाम पर दूसरे की वैध धार्मिक अभिव्यक्ति को रोक देना न तो न्यायसंगत है, न ही लोकतांत्रिक।

दूसरा और अधिक चिंताजनक पहलू यह है, कि मस्जिदों या मुस्लिम मोहल्लों के पास से शोभायात्रा गुजरने पर कुछ असामाजिक तत्व “उकसावे” का झूठा नॉरेटिव गढ़कर पत्थरबाज़ी जैसी हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि समाज को तोड़ने की साजिश भी। असहमति का रास्ता संवाद होता है, हिंसा नहीं। जो लोग पत्थर उठाते हैं, वे किसी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल अराजकता का चेहरा हैं। ऐसे मामलों में प्रशासन की निष्पक्ष और सख़्त कार्रवाई ही सामाजिक भरोसा बहाल कर सकती है।

तीसरा प्रश्न और भी मूलभूत है, यदि सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक शांति का तर्क दिया जाता है, तो फिर हिंदू धार्मिक स्थलों पर नमाज़ पढ़ने का ढोंग क्यों? अयोध्या के श्रीराम मंदिर परिसर में बार-बार नमाज़ पढ़ने के प्रयास क्यों किए जाते हैं? आस्था का सम्मान एकतरफ़ा नहीं हो सकता। जैसे मस्जिदों की पवित्रता का सम्मान अपेक्षित है, वैसे ही मंदिरों की मर्यादा भी अक्षुण्ण रहनी चाहिए। किसी भी धार्मिक स्थल को राजनीतिक या प्रतीकात्मक टकराव का मैदान बनाना, सामाजिक सौहार्द के लिए घातक है।

इस पूरे विमर्श का निष्कर्ष सीधा है, धर्म को नॉरेटिव की राजनीति से मुक्त रखना होगा। न शोभायात्राएँ उकसावा हैं, न ही आस्था की अभिव्यक्ति अपराध। अपराध है हिंसा, दोहरा मापदंड और कानून के प्रति चयनात्मक रवैया। भारत को चाहिए कि वह एक साथ दो बातों पर अडिग रहे—संविधान के तहत सभी धर्मों की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था की शून्य-समझौता नीति।

सौहार्द का रास्ता तुष्टिकरण से नहीं, समान नियम और समान सम्मान से निकलता है। जब नियम सब पर एक जैसे लागू होंगे और आस्था को राजनीति का औज़ार नहीं बनने दिया जाएगा, तभी त्योहार भी सुरक्षित होंगे और समाज भी -रामवीर यादव 

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