G News 24 : महंगाई के दौर में गरीब की थाली से छिन गई 'दाल' अब अब रह गई है, सिर्फ रोटी !

 गरीब की थाली में 'महंगाई का सबसे कड़वा सच, जब दाल रोटी' प्रमुख भोजन हुआ करती थी और अब !

महंगाई के दौर में गरीब की थाली से छिन गई 'दाल' अब अब रह गई है, सिर्फ रोटी ! 

एक समय था जब कहा जाता था कि “गरीब का खाना दाल-रोटी” है। यह पंक्ति केवल कहावत नहीं, बल्कि उस सामाजिक संतुलन की पहचान थी, जिसमें हर वर्ग के लिए भोजन की न्यूनतम उपलब्धता सुनिश्चित थी। लेकिन आज हालात इतने विकृत हो चुके हैं कि दाल खरीदना गरीब के लिए मावा खरीदने जैसा सपना बन गया है। दाल की थाली अब पेट भरने का नहीं, बल्कि जेब खाली करने का माध्यम बन चुकी है।

विडंबना यहीं खत्म नहीं होती। जिन्हें कभी गरीबों का अनाज कहा जाता था— ज्वार, बाजरा, मक्का आदि आज वही अनाज गरीब की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। कारण साफ है। मिलेट्स के नाम पर रईसों और शहरी अभिजात वर्ग ने इन अनाजों को “सुपरफूड” बना दिया। सेहत के नाम पर जब संपन्न वर्ग किसी चीज़ को अपनाता है, तो बाजार उसका मूल्य तय नहीं करता सट्टेबाजी तय करती है।

  •  नतीजा यह कि जो अनाज कभी खेत से सीधे गरीब की थाली में आता था, वह अब पैकेट में बंद होकर महंगे स्टोर्स और मॉल की शेल्फ़ में सज रहा है।
  • यह सवाल बेहद गंभीर है, ऐसे में अब गरीब करे तो करे क्या और खाए तो खाए क्या?
  • दाल महंगी, सब्ज़ियां आसमान पर, ज्वार-बाजरा “फैशन फूड”, और गेहूं-चावल पहले से ही सीमित राशन व्यवस्था पर टिके हुए। ऐसे में पोषण की बात करना गरीब के साथ क्रूर मज़ाक नहीं तो और क्या है?

सरकारें मिलेट्स को बढ़ावा देने का श्रेय ले रही हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईयर ऑफ मिलेट्स मनाया जा रहा है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि जिस किसान और मजदूर ने सदियों से इन अनाजों को बचाए रखा, वही आज इन्हें खरीदने में असमर्थ है। 

  • यह विकास नहीं, यह भोजन का वर्गीकरण है,जिसमें अमीर की सेहत और गरीब की भूख आमने-सामने खड़ी है।
  • इसलिए जरूरत इस बात की है कि नीति-निर्माता सिर्फ प्रचार नहीं, न्यायपूर्ण वितरण पर ध्यान दें। 
  • मिलेट्स को भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में गंभीरता से शामिल किया जाए। 
  • जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर सख्त नियंत्रण हो। 
  • किसानों को उचित मूल्य मिले, लेकिन उपभोक्ता खासकर गरीब लुटने न पाए।

अगर भोजन भी अमीरों की बपौती बन गया, तो यह सिर्फ आर्थिक असमानता नहीं होगी, यह सामाजिक विफलता होगी। क्योंकि जब गरीब की थाली खाली होती है, तो सिर्फ शरीर हु नहीं, लोकतंत्र भी कमजोर होता है - रामवीर यादव 

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