साहित्य में वर्षा ऋतु का वर्णन साहित्यकारों ने मनमोहक ढंग से किया है…

"झुला झूल रही सब सखियाँ, आई हरयाली तीज"

उत्सव धर्मिता के देश भारत में हर दिन हर माह किसी पर्व त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व त्योहार हमारे जीवन में उमंग उल्लास का संचार करते हैं। सावन मास आते ही हरीतिमा की चादर पूरी प्रकृति को आह्लादित कर देती है। ग्रीष्म की तपती धरती को शीतलता का एहसास मिलते ही नन्हें-नन्हें अंकुर फूटने लगते हैं। प्रकृति मानव की सहचरी है और मनुष्य का उसके साथ अन्योन्याश्रित संबंध है यही कारण है कि श्रावण मास में हरियाली और पर्यावरण को समर्पित त्यौहार हरियाली तीज उमंग और उल्लास के साथ मनाई जाती है। प्रकृति एवं मानवहृदय की सुकोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति तीज पर्व  में निहित है।  तीज का आगमन पुनर्जीवन व पुनर्शक्ति के रूप में होता है। हमारे साहित्य में भी वर्षा ऋतु का वर्णन साहित्यकारों ने मनमोहक ढंग से किया है। महाकवि कालिदास ने तो उमड़ते- घुमड़ते बादलों को ही दूत बनाकर मेघदूतम काव्य की रचना की थी । बाग - बगीचों में भोरों का गुंजार, राग मल्हार का गायन ,पपीहे की पुकार ,चारों और मोरों का शोर और नृत्य दिखाई देता है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को श्रावणी तीज कहा जाता है। इसे कहीं कज्जली तीज तो कहीं हरियाली तीज के नाम से जाना जाता है। 

हरियाली तीज नाग पंचमी से दो दिन पहले आती है। इस साल हरियाली तीज 31 जुलाई 2022 को रविवार के दिन मनाई जाएगी। भविष्य पुराण में देवी पार्वती बताती हैं कि तृतीया तिथी का व्रत उन्होंने बनाया है जिससे स्त्रियों को सुहाग और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है। खास तौर पर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार की महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिलता है । बुन्देलखंड के जालौन, झाँसी, दनिया, महोबा, ओरछा आदि क्षेत्रों में इसे हरियाली तीज के नाम से व्रतोत्सव के रूप में मनाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस, मिर्ज़ापुर, देवलि, गोरखपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर आदि ज़िलों में इसे कजली तीज के रूप में मनाने की परम्परा है। आसमान में घुमड़ती काली घटाओं के कारण ही इस त्योहार या पर्व को 'कजली' या 'कज्जली तीज' के नाम से जाना जाता है। वहीं लोकगायन की एक प्रसिद्ध शैली भी इसी नाम से प्रसिद्ध  है, जिसे 'कजली' कहा जाता है। राजस्थान में तीज का विशेष आयोजन होता है।  जयपुर के राजाओं के समय में पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे 'तीज माता' कहते हैं, को एक जुलूस उत्सव में दो दिन तक ले जाया जाता था। इस दिन स्त्रियों द्वारा माता पार्वती जी और भगवान शिवजी की पूजा करने का विशेष महत्त्व हैं। 

वर्षा की रिमझिम में प्रेम की फुहारों के बीच सोलह श्रृंगार किये हुए सुहागिन स्त्रियां झूले की पेंगों पर झूलते, लोकगीतों पर थिरकती "झूला तो पड़ गए अमुआ की डाल पै जी" गाते हुए प्रकृति का उत्सव मनाती हैं। मेहंदी रचे हाथों से जब वह झूले की रस्सी पकड़ कर झूला झूलती हैं और सखियों को झुलाती हैं तो यह दृश्य बड़ा ही मनोहारी लगता है। खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर झूला बाँधना। झूला स्त्रियों के लिए बहुत ही मनभावन अनुभव होता है। यह संदेश भी होता है कि प्रकृति से जुड़कर अपने आसपास हरीतिमा बढ़ाएंगे तभी वृक्षों की शाखाओं पर झूले डाले जा सकेंगे। देश के कई भागों में यही पूजन आषाढ़ तृतीया को मनाया जाता है जिसे हरितालिका तीज कहते हैं। दोनों में पूजन एक जैसा होता है अत: कथा भी एक जैसी है। यह महिलाओं के लिए एकत्र होने का एक उत्सव है। स्त्रियां हरा लहरिया या चुनरी की साड़ी, हरी चूड़ियां पहनकर गीत गाती हैं, मेंहदी लगाती हैं, नई दुल्हन की भांति श्रृंगार करती हैं, झूला झूलती हैं और गाती नाचती हैं। नवविवाहित लड़कियों के लिए तो विवाह के पश्चात् पड़ने वाली पहली तीज के त्योहार का विशेष महत्त्व होता है।इस दिन स्त्रियों के मायके से श्रृंगार का सामान और मिठाइयां उनके ससुराल में भेजने का भी रिवाज है ।जिसे सिंजारा कहते हैं। 

राजस्थान हो या पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रायः नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुला लेने की परम्परा है। तथा एक विशेष मिठाई जिसे "घेवर" कहते हैं, खाने का ओर खिलाने का भी रिवाज हैं। तीज के अवसर पर अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी बड़े धूमधाम से निकाली जाती है। सावन महीने में तृतीया तिथि को सौ वर्ष की तपस्या के बाद देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने का वरदान प्राप्त किया था। शिवजी ने पार्वती जी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के लिए तीज की कथा सुनाई थी। इस दिन सुहागिन स्त्रियां स्नान करके पूजा के लिए एक चौकी पर माता पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित करती हैं। माता पार्वती का सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव को बेल पत्र, भांग, धतूरा और धूप, वस्त्र आदि अर्पण किये जाते हैं विधि विधान से गणेश जी की पूजा करके हरियाली तीज की कथा सुनी जाती है और आरती की जाती है। हरियाली तीज के दिन हरे रंग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि हरा रंग भगवान शिव को अतिप्रिय है। इस त्योहार के आस–पास खेतों में ख़रीफ़ की बुवाई भी शुरू हो जाती है। अतः लोकगीतों में उस त्योहार को सुखद, सुरम्य और सुहावने रूप में गाया–मनाया जाता है।

जो कि लोकगीतों में भी मुखरित होता है।

 झुला झूल रही सब सखियां. . . . 

"झुला झूल रही सब सखियाँ, आई हरयाली तीज आज,

राधा संग में झूलें कान्हा झूमें अब तो सारा बाग़"

"अम्मा मेरी रंग भरा जी, ए जी कोई आई हैं हरियाली तीज"

वास्तव में देखा जाए तो हरियाली तीज एक धार्मिक उत्सव  के साथ साथ अपने पर्यावरण के प्रति समर्पित होने का भी संदेश है। जनसंख्या में निरंतर वृद्धि के कारण जैव विविधता में कमी आती जा रही है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वनों की अंधाधुंध कटाई कर रहा है। समूची दुनिया में आज इस विनाश की स्थिति अत्यंत चिंतनीय है कोविड-19 वैश्विक महामारी ने प्राकृतिक एवम् जैविक आपदा के रूप में संपूर्ण विश्व को झकझोर कर रख दिया है। कोरोना महामारी ने चेतावनी दी है कि हे मनुष्य! अब प्रकृति से खिलवाड़ बहुत हो चुका है , चेत जाओ अन्यथा तुम्हारा अस्तित्व भी न रहेगा। जल, जंगल और जमीन ही विकास के पर्यायवाची हैं। यदि हम दोबारा प्रकृति की ओर लौटेंगे तो ही लंबे समय तक अपना अस्तित्व बचा पाएंगे। भारत में धर्म और पर्यावरण में अत्यंत निकट का संबंध रहा है। सभी धर्मों में कुदरत की पूजा करना, कुदरत के नियमों का पालन करना और ईश्वरीय सत्ता के प्रति अपना आभार प्रकट करना प्रमुख नियम है। इस अमूल्य निधि की रक्षा करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है। आइए हम अपनी प्रकृति से प्यार करें। ऒर अपने पर्यावरण के प्रति समर्पित उत्सव त्योहारों को धूमधाम से मनाने की परंपरा को जीवंत रखें।


डॉ. दीप्ति गौड़  

(शिक्षाविद् एवम् साहित्यकार)