साउथ ऐशिया की पहली क्रियेटिव सिटी बनेगी ग्वालियर…

यूनेस्कों की क्रियेटिव सिटी के रुप में होगा ग्वालियर का विकास

ग्वालियर। हमारे लिए यह गौरव की बात है कि पूरे साउथ ऐशिया में ग्वालियर शहर को यूनेस्को क्रियेटिव सिटी के रुप में चुना गया है। ग्वालियर शहर का विकास यूनेस्को के सहयोग से हिस्टोरिकल अरबन लेंडस्केपिंग के तहत किया जाएगा। जिससे ग्वालियर शहर की विरासत को पूरी दुनिया में पहचान मिलेगी तथा ग्वालियर के संभागीय आयुक्त, कलेक्टर एवं निगमायुक्त सहित अन्य संबंधित अधिकारी यह ध्यान रखें कि शहर का विकास शहर की हैरिटेज विरासत को केन्द्रित रखते हुए किया जाए। उक्ताशय के विचार मध्यप्रदेश टूरिज्म बोर्ड के प्रिंसिपल सेकेट्री एस.एस. शुक्ला ने ग्वालियर को क्रियेटिव सिटी के रुप विकसित करने के लिए यूनेस्कों की टीम के साथ आयोजित कार्यशाला में व्यक्त किए। 

इस अवसर पर कार्यशाला में यूनेस्को नई दिल्ली से जून्ही हेन, रैंड इपिक, संभागीय आयुक्त आशीष सक्सैना, कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह, नगर निगम आयुक्त किशोर कन्याल, सीईओ र्स्माट सिटी जयति सिंह, आईआईटीटीएम के डायरेक्टर डॉ आलोक शर्मा एवं यूनेस्को के स्थानीय सलाहकार  शिशिर श्रीवास्तव सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे। उषाकिरण पैलेस होटल में आयेाजित कार्यशाला के प्रारंभ में यूनेस्कों की ओर से निशान्त द्वारा ग्वालियर की विरासत को केन्द्रित करते हुए यूनेस्कों द्वारा चयनित क्रियेटिव सिटी का एक प्रजेन्टेशन दिखाया गया। इस अवसर पर चर्चा करते हुए अधिकारियों एवं यूनेस्कों के प्रतिनिधियों द्वारा कुछ सुझाव दिए गए। 

जिसमें ग्वालियर को क्रियेटिव सिटी के रुप में विकसित करने के लिए ग्वालियर के ऐतिहासिक नगरीय परिदृश्य के अंतर्गत सभी सार्वजनिक परियोजनाओं जैसे स्वर्णरेखा नदी के ऊपर एक एलिवेटेड रोड के प्रस्ताव को क्रियान्वयन से पहले पर्यावरण मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता है। एक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और विरासत प्रभाव आकलन जिसमें विरासत स्मारकों और स्थलों को पर्यावरणीय घटकों के रूप में शामिल किया गया हो, उन सभी परियोजना प्रस्तावों के लिए एक पूर्वापेक्षा होनी चाहिए जो ऐतिहासिक स्मारकों के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत स्थलों को सीधे प्रभावित करते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण, जल संसाधन विभाग एवं अन्य संबंधित संस्थाएं जैसे हितधारकों से अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही ग्वालियर की नगरीय संरचना में निहित उसकी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए अभिलेखीय-मानचित्रों और दस्तावेजों के आधार पर ग्वालियर के ऐतिहासिक भू-उपयोग को स्थापित करना महत्वपूर्ण है। यह ऐतिहासिक भूमि उपयोग विकास के दिशा निर्देशों और विनियमों का आधार होगा, जिन्हें नगर विकास योजना में शामिल करने की आवश्यकता है। वहीं ग्वालियर में नेरो-गेज रेलवे लाइन की पुनर्स्थापना करना ऐतिहासिक नगरीय संरचना के लिए महत्वपूर्ण है और इसे एक उन्नत नगरीय आवागमन तंत्र के हिस्से के रूप में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। साथ ही बाढ़ प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए फ्लड-प्लेन जोनिंग नियमों को लागू करने की आवश्यकता है, जो बाढ़ की चपेट में आने वाले क्षेत्रों और वर्षा जल के संचय क्षेत्रों का सीमांकन करने का सुझाव देते है। 

ग्वालियर शहर में निहित स्थलाकृति और उसका ऐतिहासिक नगरीय विरासतों और स्मारकों के साथ संबंध, ग्वालियर शहर के परिदृश्य और क्षितिजों में साफ साफ दिखाई देता है। ऐतिहासिक शहरी परिदृश्य के संरक्षण और भविष्य के विकास के नियंत्रण के लिए इन परिदृश्यों और क्षितिजों की सुरक्षा एक प्रारंभिक बिंदु है। हितधारकों को शामिल करते हुए राजस्व रिकॉर्डस के अनुसार भूमि उपयोग का विश्लेषण करना आवश्यक है। सार्वजनिक संपत्ति के लिए संबंधित विभाग द्वारा ऊंचाई आदि के निर्माण नियमों को लागू करने की आवश्यकता होगी। निजी संपत्ति के मामले में, संबंधित भूमि मालिकों की सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता होगी। 

मौजूदा उदाहरण के तौर पर उड्डयन मंत्रालय द्वारा विमान संचालन की सुरक्षा के लिए ऊंचाई प्रतिबंध नियम 2015 के अंतर्गत निर्माण और पेड़ों पर प्रतिबंध, एनओसी जारी करना, कलर कोटेड जोनिंग मैप्स जारी करना आदि देखा जाता है। कार्यशाला के दौरान यूनेस्को नई दिल्ली से जून्ही हेन ने यूनेस्कों द्वारा किए जाने वाले कार्यों की जानकारी दी। संभागीय आयुक्त आशीष सक्सैना एवं कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह द्वारा विभिन्न जानकारियों दी गइ। ग्वालियर शहर के सुनियोजित विकास के लिए एक और बैठक आयोजित का फाइनल ड्राफ्ट तैयार किया जाकर यूनेस्कों को भेजा जाएगा।