आमजन के मन की बात...

आमजन से हर कार्य के बदले टैक्स और नेताओं को सब कुछ फ्री !

आम जनता जो बिना (टैक्स) कर दिए बग़ैर सांस भी नहीं ले सकती है उसे इस धरती पर रहने वाले जीवन यापन करने के लिए हाउस टैक्स,जल कर, विधुत कर जैसे जाने कौन कौन तमाम करों का भुगतान करना पड़ता है। आमजन तो इन करों का भुगतान यह समझ कर कर देता है कि चलो इसके बदले हमें जो सेवाएं-सुविधाऐं मिल रही हैं उसका यह एक तरह से मेहनताना है। लेकिन कुछ सुविधाएं देने के नाम पर सरकारें अपनी कमाई बढ़ाने के लिए जनता पर गाहे-बगाहे जनता पर टैक्स ठोकने का कार्य करती ही रहती है ऐसा ही कार्य इन दिनों स्मार्ट सिटी के नाम पर शहरों में फिजूल के कार्य (निर्माण )करवाए जा रहे हैं जिन पर होने वाले खर्चा की वसूली के लिए भी जनता पर तरह-तरह के नए टैक्स और करारोपण किए जा रहे हैं। इनमें से एक है गारवेज शुल्क

अभी तक के इतिहास में आमजन से कभी भी गारवेज शुल्क नहीं लिया गया था और इसकी जरूरत भी नहीं थी क्योंकि घरों से निकलने वाला कचरा प्राकृतिक रूप से नष्ट होते ही हो जाता है और कोई भी रेवासी अपने आसपास या अपने घर में गंदगी नहीं चाहता वह कचरे का निष्पादन स्वयं ही कर देता है। रही शहरी क्षेत्रों में कलेक्शन की बात तो इसके लिए अभी तक नगर निगम यह कार्य कर ही रही थी। लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में नगर निगम और स्मार्ट सिटी ने मिलकर गारवेज शुल्क के नाम पर आमजन से वसूली करने की तैयारी कर चुकी हैं इसमें सरोकारों की खुली छूट है।जबकि स्मार्ट सिटी के द्वारा करवाए जा रहे कार्यों से शहर में ना तो किसी को रोजगार प्राप्त हो रहा है ना शहर की यातायात व्यवस्था सुदृढ़ हुई है ना ही कहीं विशेष सफाई देखने को मिल रही है फिर भी पैसे की बर्बादी निरंतर जारी है।

एक सड़क विशेष को छोड़कर ग्वालियर में तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं पड़ता है। ऐतिहासिक ग्वालियर फोर्ट यहां साकार रूप में स्थित है इसके बावजूद भी लाखों रुपए खर्च करके उसके स्कल्पचर शहर में लगाए जा रहे हैं यह समझ से परे है क्योंकि इन पर जो पैसा खर्च हो रहा है आखिरकार उसकीवसूली तो आखिरकार शहरवासियों से ही होनी है।

राजा शाही और अंग्रेजों के जमाने में भी जब कोई इमारत है और सड़कें बना करती थी तो वे सैकड़ों साल चला करती थी लेकिन यहां तो रोजाना शहर सौंदर्यी करण के नाम पर हर दो चार पांच साल में करोड़ों अरबों की लागत से बने फुटपाथ, डिवाइडर और सड़कें तोड़ दिए जा रहे हैं या वह इतने नाजुक होते हैं कि वे खुद खुद टूटकर बिखर जाते हैं।

शहर के चौराहों पर बिजली की झालरों से ऐसे सजाने की कोशिश की जा रही है जो 4 दिन भी नहीं टिक पा रही हैं। क्या उन ठेकेदारों और अफसरों की जवाबदेही निर्धारित है?

जनाब जनता इतनी अमीर और पैसे वाली नहीं है। बेरोजगारी चरम पर है जरा रहम करो। फाइव स्टार नुमा एयरकंडीशन दफ्तरों में बैठ कर और जनता के टैक्स पर निर्भर सैंकड़ों एकड़ों में बने सरकारी महलों में फ्री में भोग विलास में बसर कर रही मानसिकता को बाहर निकालो और देखो और सोचो कि लोग कैसे तिल तिल कर  सड़कों पर मर रहे हैं। खाने पीने और बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए मोहताज है।

 नगर निगम अगर अपने बलबूते पर जनता के द्वारा विभिन्न प्रकार के टैक्स दिए जाने के बावजूद सफाई कार्य भी नहीं कर सकता है और उसके ऊपर गार्बेज शुल्क लिया जाना शर्मनाक है। जनता के द्वारा गार्बेज शुल्क दिए जाने का मतलब है कि आप और ज्यादा गारबेज फैला रहे हैं और गारबेज से फैली उस गंदगी को स्वीकार कर सूंघने को तैयार हैं।

 आखिर गार्बेज शुल्क लिया ही क्यों जा रहा है?

क्या नगर निगम की स्वताः ही जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपना यह जिम्मेदारी पूर्ण कार्य अपनी ईमानदारी और निष्ठा से अपने ही संसाधनों से संपादित करें?

जनता से क्या हर चीज का लगान लोगे?

जनता के द्वारा विभिन्न मदों में दिया जा रहा लगान ( टैक्स) कहां उपयोग/ दुरुपयोग निरंतर हो रहा है सब दिखाई दे रहा है। यदि आमजन से विभिन्न प्रकार के कर वसूल किए जा रहे हैं तो फिर स्वयं को जनता का सेवक और नौकर कहलाने वाले MLA एमपी और बड़े-बड़े प्रशासनिक शासन में बैठे लोगों से इस प्रकार के करों की वसूली क्यों नहीं की जाती है। MLA एमपी की मासिक सैलरी ₹200000 से भी अधिक होने के बावजूद इन्हें विभिन्न भत्ते और सुख सुविधाएं पूर्णता निशुल्क मिलती हैं

 ये पैसा कहां से आता है ? इस पैसे की वसूली आखिरकार जनता पर फिजूल के टैक्सेस लगाकर ही तो की जाती है! तो फिर इन लोगों को ये सुविधाएं फ्री में क्यों दी जाती है ? अगर ये नेता जनता के सेवक हैं तो इन्हें सैलरी नहीं लेना चाहिए केवल सरकारी द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं से ही इन्हें अपना काम चलाना चाहिए, और यदि नौकर हैं तो इन्हें केवल सैलरी ही मिलनी चाहिए अन्य  सुविधाएं नहीं। क्यों ये सुविधाएं बिल्कुल खत्म हो जाना चाहिए ? फिर देखते हैं कितने लोग राजनीति में सक्रिय रुप से दिखाई पड़ते हैं ? राजनीतिक पदों पर माल है मलाई है इसीलिए तो टिकटों के लिए मारामारी है , दलबदल है, ये नेता साम दाम दंड भेद किसी भी प्रकार के टिकट पाकर कुर्सी पाना चाहते हैं। जिससे कि इनका जलवा कायम बना रहे। नेता चुनने से पहले वोट मांगने आने वाले इन नेताओं से इन सवालों का जवाब इन नेताओं से जरूर मांगना चाहिए।

- दिव्या यादव