पैसा कमाओगे मगर इसे पुण्य ही पचाएगा…

पैसों के चक्कर में हर घर के खजाने में पुण्य की पेटी खाली होती जा रही है : मुनिश्री

 

ग्वालियर। आज हर कोई पुण्य कमाना चाहता है। मगर पाप करना कोई छोड़ता नहीं है। हर तरफ पैसों की मारामारी के चक्कर में हर घर के खजाने में पुण्य की पेटी खाली होती जा रही है। सब की सोच बन गई है कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। बीमार होने पर बड़े से बड़े अस्पताल में इलाज कराया जा सकता है। मगर ये कोई नहीं सोचता है कि पैसों से इलाज हो सकता है, मगर जिंदगी और निरोगी काया तो हमारे पुण्य और पुनीत कार्यों से ही मिलेगी। इसलिए पैसा कमाओ और इसका सद व्यय कर त्याग करना भी सीखो ताकि जीवन में पुण्य के रास्ते भी खुले रहेंगे।यह विचार वात्सल्य सरोवर राष्ट्रसंत मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने रविवार को नई सड़क स्थित चंपाबाग धर्मशाला में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस मौके पर मुनिश्री विजयेश सागर महाराज, मुनिश्री विनिबोध सागर महाराज ऐलक विनियोग सागर महाराज मोजूद थे।

मुनिश्री ने कहाकि पुण्य को कमाने, पुण्य को भोगने, पुण्य को त्यागने और पुण्य को बांटने के रास्ते गुरुभक्तों को बताते हुए कहा कि तुम्हारा कमाया हुआ पैसा दिखाई देता है, संपत्ति पर आपकी नजर रहती है, मगर आपके पुण्य का हिसाब-किताब भगवान रखता है। पुण्य आपका विश्वास है, मगर जिस दिन ये पुण्य विचार बनेगा उस दिन पुण्य साकार हो जाएगा। जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन आदर्श कलम मुनि श्री विहर्षसागर जी महाराज ने मंत्रों के साथ भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का जलअभिषेक कलशों से अनिल जैन, अजय जैन, विजय जैन, विकाश जैन, राहुल जैन आदि लोगों ने जयकारों के साथ किया। धर्मसभा का शुभारंभ ब्राह्मचारिणी प्रियंका दीदी ने मंगल चरण कर किया।मुनिश्री के चरणों में समिति के डॉ वीरेंद्र गंगवाल, विनय कासलीवाल, पंकज बाकलीवाल, अनिल जैन, प्रकाशचंद जैन, योगेश बोहरा, आशीष जैन आदि गुरु भक्तों ने श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद लिया।  मुनिश्री के ऑनलाइन शास्त्र प्रवचन प्रतिदिन 9-00 बजे बजे से होते है। मुनिश्री ने कहा आज का इंसान त्याग करने की बजाय भोग पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।

सुरा-सुंदरी का चक्कर, पब, बारों आदि में लाखों रुपए लूटा रहा है, मगर धर्म और दान के नाम पर इनके जेब से पांच रुपए नहीं निकलते है। फिर पुण्य की आशा भी करता है। ऐसे लोग ये भूल जाते है कि धन से जीवन धन्य नहीं होता है, इसके लिए धन का परित्याग  करना पड़ता है, और इस परित्याग से आने वाले पवित्रता ही पुण्य की प्राप्ति का माध्यम बनती है। मुनिश्री ने कहा भारतीय संस्कृति में उस जीवन को उचित कहा गया है, जिसमें शांति, संतुष्टि, पवित्रता और आनंद जैसे परम तत्व समाहित होते है। आज पैसों के दीवानगी रखने वालों के पास पुण्य नहीं है। खाओ-पिओं और मौज करने के लिए पैसे के पीछे दौड़ रहे लोगो को इस बात का भी भान नहीं है कि पैसों का उपयोग तो हर कोई कर लेगा, मगर इस पैसे को पचाने की ताकत सिर्फ पुण्य के ही पास है। अगर जीवन को ऊंचा उठाना है तो भोग को नहीं त्याग को आदर्श बनाओ।