बाल श्रमिक

  

दुध मुंही बहन माॅ की भूख, 

दिन दिन बढ़ती पिता की बीमारी 

बचपन दर दर भटकने लगा है, 

साहब आपका कानून मुझे 

बाल श्रमिक कहने लगा है 


किताबो के पर हालात ने कुतरे थे, 

मजदूरी को मजबूर दिन भूख से गुजरे थे। 


मेरी कलम भी केतली बन गई है ,

चाय की गुमटी पर मजदूरी मिल गई है। 


आपके बड़े बंगले के पीछे ही रहते है ,

सर्दी, धूप और बरसात बिना छत सहते है। 


अपनी दिवाली वासी खाने से मन जाती है, 

जिसे मेम साहब कचरे मे फेक आती है। 


आपके उतरे कपड़े उपहार से लगते है, 

कभी-कभार पहन आईना हम भी तकते है। 


याद नही माॅ ने दिया था कोई नाम, 

मिले है दुकान पर कई और उपनाम। 


आपका जुर्माना मेरा निवाला छीन लेगा, 

सेठ कल से काम न करने देगा। 


सुधार गृह मे झाड़ू पौछा मे ही करता हूॅ, 

बिना जुर्माना के आराम से रहता हूॅ। 


मेरी व्यवस्था आपके कानून से हो जाएगी, 

घर मे माॅ बहन भूख से मर जाएगी। 

 

साहब जो चल रहा है उसे आप चलने दो, 

श्रमिक का बेटा हूॅ बाल श्रमिक रहने दो। 


भूपेंद्र "भोजराज" भार्गव