चुनावी सफलाता और सत्ता की चाबी मिलते ही ये जनप्रतिनिधि जो स्वयं को कहते तो जनसेवक हैं, लेकिन इन जनसेवकों का हालातों से मुंह मोड़ना इनकी आदत में शुमार हो चला हैं..?? क्या अब सियासत हमारी व्यवस्था पर इस हद तक हावी हैं कि हम सभी के लिये बनाए गये नियम इन जनसेवकों पर लागू नहीं होते..?? क्या हम और हमारा शहर प्रदेश और देश की तक़दीर और तस्वीर  ऐसे लोगों के हाथों का खिलौना बन चुकी हैं.. लेकिन ये जनसेवक चुनाव जीतने के बाद सत्ता मिलने पर जनता की कितनी सेवा करते हैं सभी जानते हैं। 

क्या हमारे इन कर्णधारों पर उस कोरोना की गाइडलाइंस लागू नहीं होती.. जिसने अनेक ज़िंदगियों पर उम्र पूरी होने से पहले मौत की मुहर लगवा दी..? क्या स्वागत और वंदन के दौरान धारा 144 के उल्लंघन का मामला इन पर नहीं बनता ? जहां आमजन चार आदमी से ज्यादा इकट्ठे हो जाएं तो स्थानीय प्रशासन धारा 144,188 के तहत कार्रवाई करवाते हुए उनके खिलाफ f.i.r.करवाकर उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाने का इंतजाम कर देता है। विपक्षी पार्टी के सांसद विधायक व पार्षद जनता के हितों की मांग को लेकर कोई धरना प्रदर्शन करें तो इनके साथ-साथ उनके सभी कार्यकर्ताओं पर भी केस दर्ज कर लिए जाते हैं तो फिर इन जनसेवकों के साथ उदार व्यवहार क्यों ? क्या सत्ता हासिल करने के साथ ही इन्हें कानून के साथ खिलवाड़ करने का लाइसेंस मिल जाता है ? ऐसे तमाम सवाल है जो इन दिनों अंचल के आम जन के मन में उठ रहे हैं ?

दरअसल केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया बुधवार से अंचल का तीन दिवसीय दौरा शुरू कर रहे है । इसके लिये ग्वालियर मेंं दो सौ स्थानों पर भीड़ भरे स्वागत की तैयारियां, अवकाश पर गए corona को फिर से वापस काम पर बुलाने की तैयारी तो नहीं हैं।

केंद्रीय मंत्री श्रीमंत सिंधिया ग्वालियर के ही निवासी हैं और प्रत्येक ग्वालियर वासी उनका दिल से सम्मान करता हं् फिर सत्ताधारी पार्टी के द्वारा इस प्रकार का प्रपंच क्यों किया जा रहा है वह भी कोविड जैसी महामारी के द्वारा फैलने की आशंका के बीच।  उनके स्वागत की तैयारी के लिये इस प्रकार की रैली का आयोजन कर भीड़ जुटाना कहां की अकल बंदी का काम है ?

शहर के दो सैकड़ा से भी अधिक स्थानों पर स्वागत की तैयारी करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं के द्वारा शहर के बाज़ारों.. मुख्य मार्गों और रोड़ शो के तयशुदा रास्तों पर होर्डिंग्स.. बैनर्स.. पोस्टर्स की भरमार संपत्ति विरूपण अधिनियम को खुली चुनौती दी जा रही हैं । सिंधिया के स्वागत की भव्यता और दिव्यता की ज़िम्मेदारी उनके दो मज़बूत सिपाहियों के उन कांधों पर हैं जिन्हें केबिनेट मंत्री का भारी दायित्व मिला हुआ हैं!अपने राजनैतिक संरक्षक के सत्कार में दोनों ही तन-मन-धन से सक्रिय हैं। सड़कों पर सैलाब लाने की ऐसी तैयारी को देख कर तो ऐसा ही लग रहा है कि ग्वालियर ने कोविड-19 जैसी किसी महामारी का कभी सामना ही नहीं हुआ है। रातों-रात स्मार्ट सिटी ग्वालियर की उन सड़कों का पैच वर्क कार्य कर गड्ढों का नामोनिशान मिटा दिया गया है जिन से होकर श्रीमंत का काफिला गुजरेगा। 

लेकिन शहर के तमाम हिस्सों में चाहे वह हनुमान घाटी से शब्द प्रताप आश्रम विनय नगर मार्ग,मेंटल मेंटल हॉस्पिटल से उरवाई गेट मार्ग, फूलबाग चौराहे से किला गेट मार्ग हाथी जैसे तमाम सड़कें खुदी पड़ी है कीचड़ से लबालब है इन सड़कों पर वाहन चलाना तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल है। हां लेकिन जिन सड़कों से होकर श्रीमंत की रैली निकलेगी उन सड़कों की क़िस्मत यकायक चमक गई हैं.. जो अपने गड्ढों के बीच जीवित होने के सुबूत मांगते हुए दम तोड़ रही थीं।

हालांकि सिंधिया जी के दौरे को कोविड प्रोटोकॉल सहित अन्य बिंदुओं पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य बेंच जबलपुर में चुनौती दी गई है । इस मामले में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है। ग्वालियर के एक नागरिक डोंगर सिंह ने कोरोना गाइड लाइन और कोरोना की संभावित तीसरी लहर का हवाला देते हुए केंद्रीय मंत्री के दौरे के विरूद्ध मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य बेंच जबलपुर में एक जनहित याचिका दायर की है। जिसमें कोरोना गाइड लाइन और कोरोना की संभावित तीसरी लहर का ज़िक्र किया गया है। याचिका में मुख्य सचिव मध्यप्रदेश शासन, गृह विभाग के प्रमुख सचिव, ग्वालियर , मुरैना के कलेक्टर और एसपी को पार्टी बनाया गया है। 

याचिकाकर्ता डोंगर सिंह ने कोरोना से जुड़े पिछले तमाम दिशा निर्देशों का संदर्भ देते हुए सिंधिया के दौरे में कोरोना गाइड लाइन के पालन की अपेक्षा जताई हैं और कोविड नियमों का उल्लंघन होने की दशा में विधि सम्मत कार्रवाई की अपील भी की है। लेकिन जब तक अदालत कोई निर्णय देगी तब तक रैली संपन्न हो चुकी होगी। इस रैली के दौरान जो ट्रैफिक रुकेगा उसमें लोगों को तमाम तरह की परेशानियां भी होंगीं। इस परेशानी का कारण सिर्फ और सिर्फ स्वयं को जनसेवक कहने वाले यह जनप्रतिनिधि है जो जन सेवक कम जन को प्रताड़ित करने वाले ज्यादा सिद्ध हो रहे हैं जो कभी  धरना प्रदर्शनों से तो कभी रैलियां निकालकर लोगों को बेवजह परेशान करते हैं।

ख़ास बात ये भी हैं कि कांग्रेस भी इस मामले में विरोध के अपने स्वर बुलंद कर रही हैं। लेकिन कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को देखकर तो यही लेखक लग रहा है कि यह एक सांकेतिक विरोध प्रदर्शन है क्योंकि जो समय कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन के लिए चुना है उस समय में तो श्रीमंत की रैली शहर के अंदर दाखिल नहीं हो पाएगी। ऐसे में कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन क्या मायने रखता है? वैसे भी जिसने ऐसे स्वागत की नियम तोड़ती परंपरा को शहर में हमेशा जीवित रखा हो, उस पार्टी से विरोध प्रदर्शन की क्या उम्मीद की जा सकती है ? लंबे अर्से तक यही कांग्रेस महल के साथ रहते हुए धारा 144 को धता बताती रही हैं जो अब इसकी दुहाई दे रही हैं.. क्योंकि अब भी सिंधिया की सियासत वहीं हैं लेकिन पार्टी बदल चुकी है.. आज कांग्रेस जिस स्वागत परंपरा से प्रभावित दिख रही है, वह परंपरा और आदत तो उसी की देन है। अब सरकार की ऐसी दोहरी नीति के विरुद्ध विपक्षी दलों ने दस दिनी तक ग्वालियर में पदयात्रा का फ़ैसला लिया है ताकि जनता को सच्चाई से रूबरू कराया जा सकें । 

रवि यादव