अवैध कलोनियों को वैध करने की जुगत…

सुपरटेक के चालीस मंजिला टावरों पर चलेगा न्यायालय का हथौड़ा

मध्यप्रदेश में सरकार अवैध कलोनियों को वैध करने की कोई जुगत स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के पहले खोज रही है | मध्यप्रदेश हो या कोई अन्य प्रदेश बिल्डर और सरकार को ध्यान देना चाहिए की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में नोएडा स्थित सुपरटेक लिमिटेड द्वारा बनाये दो अवैध चालीस-चालीस मंजिला टावरों को गिराये जाने का आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिया है | यह आदेश देश भर के उन बिल्डरों व भ्रष्ट अधिकारियों के लिये सबक है जो उपभोक्ताओं की खून-पसीने की कमाई से खिलवाड़ करके मोटी कमाई कर रहे हैं। वस्तुत:, तमाम कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर बने इन टावरों के बनने से जनसुरक्षा और परिवेश के पर्यावरण से जुड़े पहलुओं पर खतरा पैदा हो गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने इसके लिये लंबी लड़ाई लड़ी। कोर्ट ने न केवल बहुमंजिला इमारतों को तीन माह में गिराने का आदेश दिया बल्कि घर के खरीदारों को बुकिंग के समय से उनकी देय राशि बारह फीसदी ब्याज के साथ दो महीने में चुकाने का आदेश भी दिया है। 

साथ ही सरकार से उन भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है, जिनकी मिलीभगत से भ्रष्टाचार की ये इमारतें खड़ी हो सकी हैं। इससे पहले अवैध रूप से बनी बहुमंजिला इमारतों को गलत ढंग से बनाये जाने से हवा, धूप व जीवन अनुकूल परिस्थितियां न होने पर रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मामला दायर किया था। वर्ष २०१४ में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन टावरों को गिराने के आदेश दिये थे। लेकिन इसके बाद बिल्डर राहत पाने की आस में उच्चतम न्यायालय चले गये। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने बिल्डरों व नोएडा विकास प्राधिकरण की दलीलों को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को ही लागू करने के आदेश दिये। साथ ही बिल्डरों को अपने खर्च पर टावर गिराने के भी आदेश दिये। दरअसल, प्राधिकरण के अधिकारियों की मिलीभगत से तमाम नियम-कानूनों को ताक पर रखा गया। देश में अजीब माहौल है किअनुमति मिलने से पहले ही इमारत का निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाता है । बिना अधिकारियों की मिलीभगत ऐसा कैसे संभव है कि उनकी नजर के सामने भवन निर्माण तथा उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट एक्ट की अनदेखी होती रही हो ? 

दरअसल, यह पहला मामला नहीं है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और देश के तमाम भागों में इस किस्म की बहुमंजिला इमारतों में नागरिक जीवन, सुरक्षा और हितों की अनदेखी के साथ ही पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को ताक पर रख दिया गया हो। सुपरटेक की बिल्डिंग के निर्माण में हरित क्षेत्र और खुले एरिया की अनदेखी को लेकर रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने बार-बार आवाज उठायी। शीर्ष अदालत ने स्वीकार किया कि जब प्राधिकरण बिल्डरों की मनमानी पर अंकुश लगाने में विफल रहता है तो इससे सीधे-सीधे नागरिक जीवन की गुणवत्ता बाधित होती है। लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों से मिलीभगत करके बिल्डरों का निरंकुश खेल विभिन्न आवासीय परियोजनाओं में बदस्तूर जारी रहता है। निस्संदेह खून-पसीने की कमाई से घर का सपना देखने वाले लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिये दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए। तभी भविष्य में इस अपवित्र गठबंधन की गांठें खुल सकेंगी। लोग पेट काटकर और बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अपनी छत का सपना देखते हैं। 

लेकिन अधिकारियों से मिलीभगत करके बिल्डर उनके स्वप्न को दु:स्वप्न में बदल देते हैं। निस्संदेह, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की पहल और अदालत के फैसले से देश में तमाम ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के सदस्यों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। वे अपने हितों के लिये संघर्ष करेंगे। साथ ही शेष भारत के बिल्डरों के लिये भी कोर्ट के फैसले से सख्त संदेश जायेगा कि भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से वे चाहे कितने ही ऊंचे भ्रष्टाचार के टावर खड़े कर लें, एक दिन उन्हें जमींदोज होना ही पड़ेगा। इस मामले में देर से ही सही, योगी सरकार ने प्राधिकरण के भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित करने की बात कही है। यदि इस मामले में सख्त कार्रवाई होती है तो बिल्डरों-अधिकारियों का अपवित्र गठजोड़ टूटेगा। सरकार को भी रियल एस्टेट सेक्टर के निर्माण में पारदर्शिता लाने के लिये सख्त नियम-कानूनों को अमल में लाना चाहिए। निस्संदेह, अदालत के इस फैसले से देशभर में छत का सपना देखने वाले लोगों को संबल मिलेगा कि अब बिल्डर उनके अरमानों से खिलवाड़ नहीं कर पायेंगे।