हम आधुनिक तो हो रहे हैं लेकिन…

महीनों तक चलनेवाले त्यौहार ख़त्म होते जा रहे हैं !

हम आधुनिक तो हो रहे हैं लेकिन असल जिंदगी से भी दूर हो रहे हैं।  कड़वा है मगर सच है! हम जैसे जैसे आधुनिक हो रहे हैं उसी रफ्तार से मशीनों की गिरफ्त में अभी जकड़ते जा रहे हैं और अपनी असल जिंदगी से भी दूर होते जा रहे हैं यही कारण है कि जब भी कोई त्यौहार आता है तो सोशल मीडिया में वर्चुअल बधाईयों का तांता लग जाता है, लेकिन असल जिंदगी से हम कोशो दूर भी होते जा रहे हैं। यह  कड़वा है मगर सच है! वास्तविक दुनिया में इस आधुनिकता की भागदौड़ और सोशल मीडिया के जमाने में घरों से परिवार, मेहमान, पड़ोसी, दोस्त सब नदारद होते जा रहे हैं। सुबह त्यौहार कोई भी हो चाय होली दिवाली दशहरा या कोई एक छोटा-मोटा त्योहार ही क्यों ना हो सुबह से संदेश तो अनगिनत आना शुरू हो जाते हैं, लेकिन अब इन त्योहारों पर मेहमान कम ही आते हैं। इसलिए सोचता हूँ, की ड्राइंग रूम से सोफा हटा दूं, या ड्राइंग रूम का कांसेप्ट बदलकर वहां स्टडी रूम बना दूं। 

पिछले तीन दिन से व्हाट्स एप और फेसबुक  के मेसेंजर पर मेसेज खोलते, स्क्रॉल करते और फिर जवाब के लिए टाइप करते करते दाहिने हाथ के अंगूठे में दर्द होने लगा है, संदेशें आते जा रहे हैं। बधाईयों का तांता लगा है, लेकिन मेहमान नदारद है, क्या अब ऐसे ही होने वाले हैं आने वाले समय के त्यौहार जैसे कि इस बार की होली रही है। त्यौहारों पर मिलने जुलने का रिवाज़ खत्म सा हो चला है। दरअसल घर अब घर नही रहा, ये केवल वर्क स्टेशन की तरह घर एक स्लीपिंग स्टेशन है। हर दिन का एक रिटायरिंग बेस, आराम करिए, फ्रेश हो जाईये, घर अब सिर्फ घरवालों का है। घर का समाज से कोई संपर्क नही है, मेट्रो युग में समाज और घर के बीच तार शायद टूट चुके हैं। 

हमें स्वीकार करना होगा कि ये बचपन वाला घर नहीं रहा, अब घर और समाज के बीच में एक बड़ा फासला सा आ गया है। वैसे भी शादी अब मेरिज हाल में होती है, बर्थडे मैक डोनाल्ड या पिज़्ज़ा हट में मनाया जाता है, बीमारी में नर्सिंग होम में खैरियत पूछी जाती है, और अंतिम आयोजन के लिए सीधे लोग श्मशान घाट पहुँच जाते है। सच तो ये है कि जब से डेबिट कार्ड और एटीएम आ गये है तब से मेहमान क्या ...चोर भी घर नहीं आते। मे सोचता हूँ कि चोर आया तो क्या ले जायेगा... फ्रिज, सोफा, पलंग, लैपटॉप, टीवी, कितने में बेचेगा इन्हें चोर? अरे सेल तो ओ.एल.एक्स। ने चौपट कर दी है। चोर को बचेगा क्या ? वैसे भी अब कैश तो एटीएम में है इसीलिए होम डेलिवरी वाला भी पिज़ा के साथ डेबिट मशीन साथ लाता है। सच तो ये है कि अब सवाल सिर्फ घर के आर्किटेक्ट को लेकर ही बचा है, जी हाँ...क्या घर के नक़्शे से ड्राइंग रूम का कांसेप्ट खत्म कर देना चाहिये?

जरा गौर करिये -

  • बढ़ते हुए काम के घंटे,
  • लोगों के पास अपने और अपनों के लिए समय की कमी, 
  • बढ़ता हुआ  आर्थिक दवाब,
  • एक एक मिनट और एक एक पाई का हिसाब रखना,
  • स्वेच्छा से तो पी गई ईएम आई से अपना गला घोंटने की होड,
  • लोगों की दोस्ती-यारी
  • रिश्ते-नाते, सम्बन्ध, सामुदायिक जीवन और त्योहारों का यूं चौपट होना,
  • साथ में पर्यावरण और धरती पर जीवन नाश के कगार पर पहुंच जाना,
  • बढ़ती होड़ से बढ़ता तनाव, सीने की जलन और दिल के रोग का बढ़ना,
  • आपसी होड़ के चलते काम के घंटों का बढ़ना,
  • लोगों के पास अपने और अपनों के लिए समय की कमी,
  • इन सारी समस्याओं की जड़ में क्या है? 

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