सीसीएफ़ की 38 वी ई संगोष्ठी हुई सम्पन्न…

पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर सजग रहे स्टेकहोल्डर्स : कविता भण्डारी

ग्वालियर। देश की ख्यातिप्राप्त बाल अधिकार विशेषज्ञ श्रीमती कविता भंडारी का मानना है कि पॉक्सो अधिनियम में जोड़े गए नए प्रावधान यौन अपराधों से बचपन को समग्रता से सुरक्षित करने की गारंटी देते है लेकिन समाज और जबाबदेह तंत्र को भी अपनी भूमिका का निर्वहन पूरी संवेदनशीलता के साथ किये जाने की आवश्यकता है। श्रीमती भण्डारी ने आज चाईल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 38 वी ई संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पॉक्सो एक्ट की बारीकियों औऱ व्यवहारगत परेशानियों पर देश भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि यह कानून शब्दकोशीय परिभाषा में शामिल बालक के सर्वोत्तम हित के साथ उसकी पहचान को उच्च प्राथमिकता पर सरंक्षित करता है।

एक बालक जब यौन हिंसा का शिकार होता है तब वह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक और जन्मजात प्रतिभा के स्तर पर भी बुरी तरह से टूट चुका होता है इसलिए ऐसे मामलों में सभी स्टेकहोल्डर्स को गहरी मानवीय औऱ बाल सुलभ मानसिकता के साथ काम करने की आवश्यकता होती है। श्रीमती भण्डारी के अनुसार पॉक्सो कानून की धारा 3,5,7,एवं 9 समेकित रूप से यौन हिंसा को कवर करती है और 2019 के संशोधित प्रावधान ऐसे आरोपियों के विरुद्ध 20 साल के कठोर कारावास के साथ मृत्युदंड तक सुनिश्चित करते है।

 इसलिए पॉक्सो के अभियोजन पक्ष से जुड़ी सभी एजेंसियों को पूरी निष्ठा के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।उन्होंने पॉक्सो में पीड़ित बालकों के पुनर्वास में बाल कल्याण समितियों की महती भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि धारा 19 के तहत खुद संज्ञान लेने से लेकर घटनाओं की रिपोर्टिंग,प्रतिकर एवं भरणपोषण व्यवस्था जैसे मामलों में समितियों को अतिशय सक्रियता के साथ अपनी जबाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिये। श्रीमती भण्डारी ने पॉक्सो के कतिपय दुरूपयोग की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के कुछ वर्गों में अपने न्यस्त स्वार्थों,धन लिप्सा औऱ दाम्पत्य विवाद में अनुचित लाभ के लिए बालकों को मोहरा बनाया जा रहा है।

यह समाज के गिरते हुए चरित्र की खतरनाक प्रवर्ती है इसे रोकने में सभी स्टेकहोल्डर्स को आगे आकर पहल करने की आवश्यकता है।श्रीमती भण्डारी ने पॉक्सो के लगभग सभी सेक्शन्स औऱ उनके अनुप्रयोग से जुड़ी व्यवहारिक दिक्कतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने बाल शोषण से जुड़े  प्रमुख वैश्विक अध्ययन साझा करते हुए बताया कि ऑस्ट्रेलिया में 21.5 फीसदी, बालिकाएं, अफ्रीका में 19.3 फीसदी बालक यौन अपराध के शिकार होते है।वही भारत मे 53.22 फीसदी बालकों साथ एक या अधिक बार जीवन मे यौन दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ता है।बर्ष 2018 तक 109 बालक रोजाना ऐसे मामलों के शिकार होते है और यह आंकड़ा 22 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।डॉ चोबे के अनुसार96.9 फीसदी मामलों में लैंगिक अपराध करने वाले कोई न कोई परिचित जन शामिल होता है। 

संगोष्ठी में किशोर न्याय अधिनियम 2015 में हालिया संसद में प्रस्तावित संशोधन प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई।ग्वालियर के पूर्व सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष डॉ के के दीक्षित ने संशोधन प्रस्तावों पर असहमति दर्ज कराते हुए कहा कि एडॉप्शन एवं सुनवाई के मामलों में प्रस्तावित  संशोधन डीएम को असीमित अधिकार प्रदान करते है जिनके कानून बनते ही डीएम की आड़ में कलेक्टर की कार्य सँस्कृति जेजे एक्ट पर हावी हो जायेगी।कटनी के पूर्व अध्यक्ष राकेश अग्रवाल ने एडॉप्शन के मामलों में डीएम को दिए जाने वाले अधिकारों के साथ बालकों की खरीद फरोख्त की प्रक्रियागत संभावनाओ को रेखांकित किया

।उज्जैन के अध्यक्ष लोकेंद्र शर्मा ने प्रस्तावित संशोधन में संज्ञेय अपराधों की सुस्पष्ट परिभाषा का स्वागत किया।एडवोकेट रूपसिंह ने विभिन्न संशोधनों के विधिक पक्ष को साझा किया।मुरैना के जेजेबी सदस्य राकेश शिवहरे का स्पष्ट मत था कि नए संशोधन प्रस्ताव जेजे एक्ट औऱ खासतौर से सीडब्ल्यूसी के अधिकार को अतिक्रमित करते है और इन्हें स्वीकार नही किया जाना चाहिए। फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र शर्मा ने संगोष्ठी में आये सुझावों को शासन स्तर तक पहुचाने का भरोसा दिलाते हुए ई संगोष्ठी के नवाचार को एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। संगोष्ठी में राजस्थान, यूपी, बिहार, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, बंगाल, गोवा, मणिपुर, असम के प्रतिभागियों ने भी अपनी बात रखी।