बांटो और राज करो की फिरंगी रणनीति…

सत्याग्रह में भितरघात की तैयारियां शुरू

पिछले 54 दिन से दिल्ली की देहलीज पर जमे किसानों के सत्याग्रह के ‘ साइड इफेक्ट ‘ अभी तक किसी को नजर नहीं आ रहे लेकिन मुझे ये दिखाई देने लगे हैं .सरकार किसान संगठनों की मांगें मानने के बजाय अब इस आंदोलन को दो फांक कर तोड़ने की कोशिश में जुट गयी है . ‘ बांटो और राज करो ‘ की फिरंगी रणनीति के तहत अब सरकार की ओर से सत्याग्रह में भितरघात की तैयारियां शुरू कर दी गयीं हैं . देश की पहली और कथित रूप से सबसे मजबूत और लोकप्रिय सरकार जब किसानों को नहीं झुका सकी तो उसने साम-दाम,दंड और भेद का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.जब उसे इसमें भी कामयाबी नहीं मिली तो अब सरकार की और से दूसरे हथकंडे इस्तेमाल किये जाने लगे हैं .सरकार एक तरफ किसान संगठनों से बातचीत का नाटक किये जा रही है. किसान आंदोलन से निबटने में नाकाम सरकार ने छद्म तरीके से देश की सबसे बड़ी अदालत का इस्तेमाल करने की कोशिश की लेकिन इसमें भी उसे कामयाबी नहीं मिली. सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गयी कमेटी के दो सदस्यों ने अपने आपको इस पचड़े से अलग कर लिया .

एक तरह से ये विधिक संस्थाओं में अविश्वास की पराकाष्ठा है .पिछले कुछ वर्षों में देश की तमाम विधिक रूप से गठित संस्थाओं का मान इनके दुरूपयोग की वजह से कम हो रहा है. राजनीतिक अहंकार के कारण किसान आंदोलन का समापन सम्मानजक तरीके से नहीं हो रहा है. आंदोलन जितना लम्बा खिंच रहा है ,उतनी ही जटिलताएं बढ़ रहीं हैं. आंदोलन संचालकों के सामने सरकारी हथकंडों से निबटते हुए एकता को बनाये रखना सबसे बड़ी चुनौती है वहीं सरकार के सामने इस आंदोलन की वजह से पूरी दुनिया में हो रही देश की बदनामी को रोकने का संकट है . किसानों के आंदोलन में राजनीति देखकर ही सरकार ने पहली गलती की .जैसे ही अकाली दल ने इन कानूनों के खिलाफ सरकार से अपना रिश्ता तोड़ा था वैसे ही सरकार को सम्हल जाना चाहिए था,तब सरकार को लगा की आकाली दल के अलग होने से सरकार का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है लेकिन अब हड्डी गले में बुरी तरह फंस गयी है .अब अकालीदल भी परिदृश्य से गायब है .अब तो न जाने कौन-कौन इस आंदोलन के साथ जुड़ता जा रहा है ,किसान आंदोलन के प्रति बढ़ रहे राष्ट्रव्यापी समर्थन से घबड़ाकर अब सरकार ने आंदोलन में फूट डालने के लिए किसान नेता गुरुनाम सिंह चढूनी पर दांव लगाया लेकिन वो भी नाकाम साबित हुआ .चढूनी बेपर्दा हो गए ,उन पार भीतरघात करने का आरोप लगा ही नहीं बल्कि प्रमाणित भी हो गया .

अब वे अलग-थलग पड़ गए हैं . पिछले दो माह में सरकार ने अपनी प्रतिष्ठा के साथ-साथ माननीय सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को भी दांव पार लगाने की गलती की लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ. आंदोलन अपनी जगह है और सरकार की नाकामी अपनी जगह. जैसे -जैसे समय बीत रहा है किसान संगठनों की रणनीति भी बदल रही है .किसान अब तक साथ साथियों की जान गंवा चुके हैं लेकिन सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया है.शायद सरकार सोच रही है की इन शहादतों से किसान खुद ही टूट कर अपने घर लौट जायेंगे ,लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. किसान अब सिंघु बॉर्डर पर 23-24 जनवरी को ‘‘किसान संसद’ की तैयारी कर रहे है। सड़क पर आयोजित होने वाली इस ‘संसद’ में विपक्षी दलों के नेताओं के अलावा कई सामाजिक संगठनों से जुड़ी नामचीन हस्तियों के जमावड़े की तैयारी है। गौततलब है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने अब तक अपनी इस लड़ाई से विपक्षी राजनीतिक दलों व नेताओं से गुरेज कर रखा है, लेकिन यह महज संयोग है या प्रयोग कि उसी संयुक्त किसान मोर्चा की रविवार को हुई रणनीतिक बैठक से भाकियू नेता गुरनाम सिंह चढूनी गायब रहे। वह कांस्टीट्यूशन क्लब में ‘किसान संसद’ के नए राग के लिए साज तैयार कर रहे थे। चढ़ूनी ही इस किसान, मजदूर, बेरोजगार, कर्जदार समर्थक जनप्रतिनिधि संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष हैं।आंदोलन की पूर्व घोषित रणनीति के तहत 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद बोस की जयंती पर उनकी याद में संयुक्त किसान मोर्चा ने देश में आजाद हिंद किसान फौज बनाने का एलान कर रखा है। खासतौर से बंगाल में इसे ऐतिहासिक बनाने की तैयारी है। दिल्ली-एनसीआर बॉर्डर के सभी आंदोलन स्थलों पर इस दिवस को यादगार बनाने को संपर्क जारी है। लगता है कि राजहठ के बजाय यदि सरकार खुद संसद का विशेष सत्र बुलाकर इन कानूनों को रद्द कर दे तो न सिर्फ किसानों का मान रह जाएगा अपितु सरकार और सुप्रीम कोर्ट का मान भी बचा रहेगा. 

सरकार फिर सबसे चर्चा कर नए कानून बना सकती है. संसद में उसके पार अखंड समर्थन है ही .नए स्वरूप में बने कानूनों से किसान सत्याग्रह का सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी .दुर्भाग्य ये है कि सरकार के पास इस समय किसान संगठनों के साथ मध्यस्थता करने वाला कोई सम्माननीय व्यक्ति नहीं है. सरकार खुद तो अविश्वसनीय हुई ही साथ भी उसने तमाम व्यक्तियों और संस्थाओं को भी अविश्वसनीय बना दिया ,अन्यथा ऐसी नौबत न आती . आंदोलन के चलते रोजाना देश को 3500 करोड़ रूपये का नुक्सान हो रहा है,मुमकिन है कि हो भी रहा हो लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?किसान तो कब के अपने घरों को लौट जाते जो सरकार उनकी बातें मान लेती लेकिन सरकार का अपना हाथ है किसानों का अपना संकल्प .किसान खाली हाथ लौटता है तो देश में ये गांधीवादी सत्याग्रह की सबसे बड़ी हार होगी और यदि बैठा रहता है तो ये जनादेश से चुनी हुई सरकार की सबसे बड़ी नाकामी .समझदारी इसी में है कि दोनों पक्ष समझदारी से काम लें और देश को अराजकता की और बढ़ने से रोकें.