आदिवासियों को वन विभाग ने पुनः किया बेदखल...

झोपड़ियों को आग के हवाले कर खुले में रहने को किया मजबूर

ग्वालियर। विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाली हमारे प्रदेश की सरकारें आजादी के 73 साल गुजर जाने के बाद भी आदिवासियों को आज भी अपना सिर ढंकने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। इसका ताजा उदाहरण ग्राम-खाड़ी का ताल जो कि नयागांव से 5-6 किमी दूर बनवार रोड पर स्थित है, में देखने को मिला है। ग्वालियर जिले के तहसील-घाटीगांव, विकासखण्ड-बरई में ग्राम खाड़ी का तालाब जो कि नयागांव से 5-6 किमी. दूर बनवार रोड पर स्थित है। लगभग 25 वर्ष पहले इस गांव में लगभग 15 आदिवासी परिवार निवास करते थे। ये सभी परिवार चूंकि ताल के पास ही रहते थे इसलिए बरसात के बाद जब भी पानी कम होता ये सभी आदिवासी ताल की लगभग 980 बीघा जमीन पर खेती करते थे और फसल होने पर उसका बराबर बंटवारा कर लेते थे। इन आदिवासी परिवारों के जीवन का यही आसरा था, इसी से ये सभी अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। 

कुछ सालों में इनका परिवार बढ़ता गया और इनकी झोपड़ियां भी बढ़ती गईं। इनकी खेती पूरी तरह मौसम पर ही निर्भर थी इसलिए जिस वर्ष पानी अच्छा हो जाता ये लोग फसल भी अच्छी कर लेते थे परन्तु जिस वर्ष मौसम की मार इन पर पड़ती, रोटी के लाले ही हो जाते। शहर से लगा होने के कारण धीरे-धीरे ये आदिवासी परिवार अपनी रोजी-रोटी व रोजगार की तलाश शहरों में भी करना शुरू कर दिया, कुछ परिवार मजदूरी के लिए शहरों आते और शाम को चले जाते थे। ऐसे ही इनका पूरा जीवन कटने लगा। इन आदिवासी परिवारों का पूरा जीवन ही कठिनाईयों के दर्द की कहानी है। जब इनके जीवन के बारे में कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने अपनी परेशानियों को साझा किया, जो इस प्रकार है- तुलफा आदिवासी पत्नी स्व. श्री ज्ञानी आदिवासी, उम्र-45 वर्ष, इस उम्र में वे 60 की बुजूर्ग महिला लगती हैं। 

एकदम दुबली, पतली, चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई, हाथ की चमड़ी इस उम्र में लटकने लगी है, बच्चे अलग रहते हैं, जब इनसे बात की तो उन्होंने बताया कि वे लगभग 20 वर्षों से यहां निवास कर रही हैं, इनकी जब शादी हुई तो ये इसी गांव में दुल्हन बनकर आयी थीं, यहीं इनके सास-ससुर भी रहते थे। शुरूआत में पूरा गांव सामुहिक खेती करता था, उसी से पूरा परिवार पलता था, ये भी अपने पति के साथ खेतों में ही काम करती थीं, परन्तु धीरे-धीरे खेती से आमदनी कम होने लगी और इन्हें रोजगार के लिए गांव से शहर आना पड़ता था। 

तुलफा आदिवासी ने बताया कि 1995-96 में वन विभाग के लोगों ने आकर गांव में सभी झोपड़ियों को तोड़ दिया एवं आग लगा दी, जिससे सभी आदिवासी बेघर हो गये, परन्तु इन लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और फिर अपनी झोपड़ी वहां पर बना ली, तबसे लेकर आज तक लगभग पांच से छः बार वन विभाग के लोगों ने इन्हें गांव छोड़ने के लिए इनकी झोपड़ियों में आग लगाई है। वन विभाग के इन अत्याचारों से परेशान होकर कई आदिवासी अपने परिवार लेकर दूसरी जगह चले गये परन्तु आज भी लगभग 15 परिवार वहां अपना आशियाना बनाये हुए हैं। कुछ ऐसी ही कहानी पारोबाई पत्नी रामजीलाल आदिवासी, कैलाशी बाई आदिवासी सहित दर्जनों आदिवासी महिलाओं की है, जो आज भी वन विभाग का दमन सहते हुए अपनी जमीनों का कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है। 

श्याम कुमार बाल्मिक, अजय बाल्मिक, लखना आदिवासी ने बताया कि पहले हमारे गांव में म.प्र. किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा के नेता आते थे, उनसे हमें बहुत हिम्मत मिलती थी, परन्तु धीरे-धीरे हमारी एकता टूटती गई और इन संगठनों के नेताओं का आना भी कम हो गया तबसे वन विभाग का आतंक हम आदिवासी परिवारों पर बढ़ गया है। दिनांक 06 नवम्बर 2020 को जब इन आदिवासी परिवारों के पुरूष काम पर गये थे और घर पर महिलायें थी, उसी वक्त वन विभाग के लोगों ने जाकर आदिवासी परिवारों की झोपड़ियों को तहस-नहस कर दिया और महिलाओं के साथ मारपीट और गाली-गलौज किया, तथा महिलाओं को धमकी भी दी कि अगर यहां फिर दिखे तो देखना रात में तुम्हारा क्या हर्ष करते हैं ? 

तब ये सभी आदिवासी परिवार मध्यप्रदेश किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा के जिला कार्यालय, नई सड़क पर उपस्थित होकर संगठन के नेता अखिलेश यादव और रामबाबू जाटव से मुलाकात कर पूरी घटना से अवगत कराया। अगले दिन इन नेताओं ने पूरे क्षेत्र का दौरा किया और वनविभाग के अत्चाचारों को देखा तथा सभी आदिवासी परिवारों से चर्चा की, समाचार पत्रों में खबर दी, अधिकारियों से चर्चा की परन्तु दिनांक 25 नवम्बर 2020 को पुनः वन विभाग द्वारा आदिवासी परिवारों की झोपड़ियों को तोड़ना व आग के हवाले करने की घटना सामने आयी। पुनः सभी आदिवासी परिवार म.प्र. किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा के कार्यालय में आये तब पूरी घटना को काॅमरेड रामविलास गोस्वामी और श्याम यादव ने सुना तथा संभागीय आयुक्त के यहां पहुंचकर ज्ञापन दिया तथा तत्काल कार्यवाही की मांग की।