कलक्ट्रेट में आदिवासी गौरव दिवस के रूप में…

ग्वालियर में मनी जन नायक बिरसा मुण्डा की जयंती

ग्वालियर। ग्वालियर जिले में जन नायक बिरसा मुण्डा की जयंती आदिवासी गौरव दिवस के रूप में मनाई गई। यहाँ कलेक्ट्रेट स्थित जन-सुनवाई सभागार में आयोजित हुए कार्यक्रम में स्व बिरसा मुण्डा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रृद्धांजलि दी गई। साथ ही सभी ने जन नायक बिरसा मुण्डा द्वारा आज़ादी के लिए किए गए साहसिक संघर्ष को याद किया और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी शिवम वर्मा ने इस अवसर पर कहा कि हम सबके लिए गर्व की बात है कि हम उसी देश के वासी हैं जहाँ बिरसा मुण्डा जैसी विभूतियाँ जन्मी थीं। 

जब हम जन नायक बिरसा मुण्डा के आदर्शों को आत्मसात करेंगे तभी उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम सभी को उनके आदर्शों पर चलकर देश और समाज की भलाई के लिए काम करना चाहिए। श्री वर्मा ने कहा कि इसी भाव के साथ संघर्ष कर हमें कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ना है। अपर कलेक्टर किशोर कान्याल ने कहा कि बिरसा मुण्डा ने जंगलों में रहकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और सदा के लिए अमर हो गए। जिला पंचायत सदस्य भगवान सिंह ने कहा कि बिरसा मुण्डा ने अपने सुकृत्यों एवं वीरतापूर्ण कामों से आदिवासी समाज ही नहीं सम्पूर्ण देशवासियों का मान बढ़ाया। 

बिरसा मुण्डा उस महानायक का नाम है, जिसने मुंडा जनजाति के विद्रोह का नेतृत्व किया था। 15 नवम्बर 1875 को जन्मे जन नायक बिरसा मुण्डा के पिता सुघना मुण्डा एवं माता करनी मुण्डा खेतिहर मजदूर थे। सिंहभूम प्राचीन बिहार का वह भूभाग है जो वर्तमान में झारखंड के नाम से जाना जाता है। यहाँ की प्रमुख नगरी रांची 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में बिरसा विद्रोह की साक्षी रही है। एक इष्ट के रूप में पूजित बिरसा मुण्डा पूरे मुण्डा समाज के साथ-साथ देश के आदिवासी समाज की अस्मिता बन गए। बिरसा ने पूरे जंगलों की प्राणवायु को संघर्ष की ऊर्जा से भर, सबके जीवन का आधार बना दिया था। बिरसा बचपन से ही बड़े प्रतिभाशाली थे। कुशाग्र बुद्धि के बिरसा का आरंभिक जीवन जंगलों में व्यतीत हुआ। उनकी योग्यता देखकर  उनके शिक्षक ने बिरसा को जर्मन मिशनरी स्कूल में भर्ती करवा दिया। इसकी कीमत उन्हें धर्म परिवर्तन कर चुकानी पड़ी। 

यहाँ से मोहभंग होने के बाद बिरसा पढ़ाई छोड़ चाईबासा आ गए। देश में स्वाधीनता की आवाज तेज होने लगी थी। बिरसा पुन: अपने आदिवासी धार्मिक परंपरा में वापस लौट आए। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीतियों के द्वारा पहले जंगलों का स्वामित्व आदिवासियों से छीना फिर बड़े जमीदारों ने वनवासियों की जमीन हड़पना शुरू की। इस अन्याय के विरूद्ध बिरसा मुण्डा ने ब्रिटिशों, क्रिश्चियन मिश्नरियों, भूपतियों एवं महाजनों के शोषण अत्याचारों के खिलाफ छोटा नागपुर क्षेत्र में मुण्डा आदिवासियों के विद्रोह (1899-1900) का नेतृत्व किया। 3 मार्च 1900 को अंग्रेजों ने बिरसा को गिरफ्तार कर रांची जेल में बंद कर दिया। जेल में शारीरिक प्रताड़ना झेलते हुए 9 जून 1900 को बिरसा वीरगति को प्राप्त हो गए। बिरसा मरकर भी अमर हैं। छोटा नागपुर के जंगलों में आज भी बिरसा लोकगीतों में जीवित है।