कश्मीर के साथ की गई कथित ज्यादती का विरोध जारी…

महबूबा की रिहाई

14 महीने की गिरफ्तारी के बाद आखिर पीडीपी अध्यक्ष और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को भी रिहा कर दिया गया। पिछले साल 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 के खात्मे के जरिए जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के फैसले के बाद उन्हें कश्मीर के कई अन्य राजनेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। उनकी रिहाई के साथ ही जम्मू-कश्मीर में मुख्यधारा की पार्टियों के सभी प्रमुख नेता रिहा हो चुके हैं। राज्य के सभी राजनीतिक दलों और व्यक्तित्वों ने इस रिहाई का स्वागत किया है। हालांकि खुद महबूबा ने काफी तीखेपन के साथ दोहराया है कि वह नई दिल्ली द्वारा कश्मीर के साथ की गई कथित ज्यादती का विरोध जारी रखेंगी। यह बात अन्य कश्मीरी नेता भी दोहराते रहे हैं।

हाल में फारूख अब्दुल्ला के उस बयान को लेकर खासा विवाद भी हुआ जिसमें उन्होंने कथित तौर पर चीन के सहयोग से अनुच्छेद 370 और 35-ए को वापस हासिल करने की बात कही थी। हालांकि नैशनल कॉन्फ्रेंस ने बाद में इस बात का खंडन करते हुए कहा कि उनके बयान को गलत ढंग से पेश किया गया, लेकिन फारूख अब्दुल्ला जैसे बड़े कद के नेता को अपने बयानों में ऐसी किसी गलतफहमी की गुंजाइश भी नहीं छोड़नी चाहिए। किसी स्वतंत्र और संप्रभु देश में संसद के किसी फैसले से अगर आपका विरोध है तो अपनी बात देश के सभी संभव मंचों पर रखने का रास्ता आपके सामने खुला है। 

इस प्रक्रिया में किसी और देश को शामिल करना जिम्मेदार सोच का परिचायक नहीं है। इससे कुछ भी हासिल होना तो दूर, आप पहले से अधिक अलग-थलग पड़ते जाते हैं, साथ में दोनों देशों की आपसी कड़वाहट को और ज्यादा बढ़ाने की भूमिका भी निभाते हैं। बहरहाल, नेताओं की बयानबाजी को एक तरफ रख दें तो भारत सरकार के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि कश्मीर को लेकर उसकी चुनौतियां अब बदल चुकी हैं। अनुच्छेद 370 से संबंधित फैसले को एक साल से ऊपर हो चुका है और कश्मीर में शांति बनाए रखने का तात्कालिक दबाव समाप्त हो चुका है। अभी मुख्य चुनौती कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने की है।

इतना तय है कि पिछले एक साल से कश्मीर की जो स्थिति है उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कोई बहुत अच्छी छवि नहीं जा रही है। पाकिस्तान अगर कश्मीर को लेकर कोई बयान देता है तो उसे खास तवज्जो नहीं मिलती, लेकिन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग जैसे मंचों से उठते गंभीर स्वरों की ज्यादा समय तक अनदेखी नहीं की जा सकती। कश्मीरियों का सुकून भी कश्मीर में शांति जितना ही जरूरी है। इस सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों का मन अशांत रहना विदेशी ताकतों का काम आसान कर देता है। इसलिए पहली जरूरत है कश्मीरियों का विश्वास जीतने की, और यह काम संवाद बढ़ाकर ही किया जा सकता है। बेहतर हो कि आ रहे जाड़ों में सीमावर्ती क्षेत्रों में जमी बर्फ का फायदा उठाते हुए सरकार कश्मीरियों के साथ अपने रिश्तों में गरमाहट लाए ताकि आपसी विश्वास को एक नई जमीन मिल सके।