गरुण पुराण में बताया गया है कि…

गायब हुए कौवे, कैसे पहुंचे पितरों तक भोजन !


ग्वालियर। पितृपक्ष 2 सितंबर से प्रारंभ हो चुके हैं, इन दिनों में अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर उन्हें भोजन कराने का धार्मिक ग्रंथों में विधान है। पितरों को भोजन कौवों के माध्यम से पहुंचता है, लेकिन शहर से विगत कुछ सालों से कौवे गायब हो चुके हैं। लोग अपने पितरों को भोजन कराने के लिए घंटों तक छतों पर खड़े होकर कौवों को बुलाते हैं, लेकिन एक भी कौवे भोजन ग्रहण करने के लिए नहीं पहुंच रहा है। इसके चलते अब लोग शहर के बाहरी क्षेत्रों में कौवों को भोजन कराने के लिए पहुंच रहे हैं। गरुण पुराण में बताया गया है कि श्राद्धपक्ष के दौरान पितरों को भोजन कराने से वह प्रसन्न होते हैं। पितरों को उनके स्वजनों द्वारा बनाए गए पकवान पहुंच सके इसके लिए कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन कराना आवश्यक है, लेकिन विगत कुछ सालों से शहर से कौवे गायब हो चुके हैं। 

शहर से गायब हुए कौवों ने अब जंगली व बाहरी इलाकों में अपना डेरा बसा लिया है। इसके कारण शहर में अब कौवे नहीं दिख रहे हैं। त्रेतायुग में जब भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ वनवास काट रहे थे तब इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारी थी। इससे नाराज होकर एक तिनके से प्रभु राम ने जयंत की आंख फोड़ दी थी। जयंत ने जब अपने किए की माफी मांगी तब प्रभु श्रीराम ने कौवे को वरदान दिया था कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। 

त्रेतायुग से ही श्राद्धपक्ष में कौंवों को भोजन कराने की परम्परा चली आ रही है। पक्षी विशेषज्ञ गौरव परिहार के अनुसार कौवे पीपल व बरगद के बीज सबसे अधिक खाते हैं। पेट में पहुंचकर बीज के ऊपर का गूदा व पचा लेते हैं। जबकि बीज को वह फर्टिलाइज कर फैला देते हैं। इससे बहुत जल्दी जंगल पनप जाता है। वहीं शहर से बड़े पेड़ गायब हो चुके हैं इसलिए उनकी संख्या पर असर पड़ा है। क्योंकि वे ऊंचे वृक्षों पर ही अंडे देते हैं। इसलिए सनातन संस्कृति में कौवों को संरक्षण प्रदान किय गया है। पक्षी विशेषज्ञ गौरव परिहार के अनुसार मादा कौवे जून- जुलाई में अंडे देते हैं। श्राद्धपक्ष से पूर्व इन अंडों से बच्चे निकल आते हैं। श्राद्धपक्ष में पौष्टिक भोजन मिलता है इससे कौवे के बच्चों को विकसित होने में बहुत मदद मिलती है।