जंगल में रहें जानवर, तभी हम वायरस से बचेंगे !

कोरोना महामारी से एक चीज शीशे की तरह साफ हुई है कि मानव जाति को नए-नए वायरसों से उत्पन्न होने वाले खतरों से हर समय सजग रहना पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने उन कारणों को पहचानने की कोशिश की है जिनसे ये वायरस जानवरों से मनुष्य में पहुंचते हैं। इनके अध्ययनों में चौंकाने वाली बात यह है कि स्तनपायी जीवों से मनुष्य में वायरस के जंप करने की घटनाएं कुदरत से छेड़छाड़ के साथ जुड़ी हुई हैं। एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में वायरस के जंप करने को ‘वायरस स्पिलोवर’ भी कहा जाता है। वायरस स्पिलोवर का खतरा उस समय सबसे ज्यादा होता है जब प्रकृति के अत्यधिक दोहन और प्राकृतिक वास के विनाश से जंगली जानवर खतरे में आ जाते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के रिसर्चरों ने एक डेटा विश्लेषण के आधार पर यह बात कही है। यह रिसर्च कोरोना के शुरू होने से कई वर्ष पहले की गई थी। 

इस अध्ययन की प्रमुख लेखक डॉ. क्रिस्टीन जॉनसन ने कहा कि वे उन कारणों को समझना चाहते थे जिनसे वायरस जानवरों से मनुष्यों में पहुंचता है। वे यह भी देखना चाहते थे कि अतीत में ऐसी कौन सी बातें सामने आईं जो भविष्य में वायरस ट्रांसफर को रोकने में मददगार हो सकती हैं। जानवरों और मनुष्य के बीच पहुंचने वाली बीमारी को ‘जूनॉटिक’ कहते हैं। बैक्टीरिया, परजीवी, फफूंदी और वायरस वगैरह इस तरह की बीमारी फैलाते हैं। जानवरों द्वारा उत्पन्न कुछ बीमारियां आसानी से मनुष्यों में पहुंच सकती हैं, क्योंकि स्तनपायी जीवों की जैविक बनावट बहुत कुछ मनुष्यों जैसी होती है। मनुष्य अक्सर सुअरों और मवेशियों से फैलने वाली बीमारियों का शिकार होता है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि मनुष्य अपनी भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए सदियों से इन जानवरों को पाल रहा है। 

मनुष्यों में वायरस ट्रांसफर के मुख्य स्रोत चमगादड़ और दूसरे स्तनपायी जीव हो सकते हैं, क्योंकि उनकी जैविक बनावट और वायरस के प्रति उनके इम्यून रेस्पॉन्स लगभग एक जैसे होते हैं। मनुष्यों के कारण जानवरों में तनाव और स्ट्रेस से भी ट्रांसफर के चांस बढ़ते हैं। जब हम जानवरों को उनके कुदरती माहौल से निकाल कर उनका व्यापार करते हैं, तो उन्हें भारी तनाव का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में वे ज्यादा वायरस उत्पन्न करते हैं। वायरसों की संख्या अधिक होने का मतलब यह है कि शरीर से वायरस का परित्याग भी अधिक होगा। इसलिए पकड़े गए जानवर मानव आबादी को वायरस से सीधे एक्सपोज करते हैं। रिसर्चरों ने जूनॉटिक वायरसों और जमीन पर विचरने वाले उनके मेजबान स्तनपायी जानवरों पर स्टडी की। इसके लिए उन्होंने 2004 से 2013 तक के डेटा का अध्ययन किया। उन्होंने जिन 142 वायरसों की स्टडी की, उनमें 139 वायरसों के मेजबान स्तनपायी जीव थे। 

कुत्ते-बिल्लियों, मवेशियों, घोड़ों और भेड़ों जैसे पालतू स्तनपायी जीवों में कम से कम 50 प्रतिशत वायरस ऐसे हैं, जो मनुष्यों में ट्रांसफर हो सकते हैं। चमगादड़, चूहों और प्राइमेट जीवों में भी जूनॉटिक रोगों की मात्रा का अनुपात बहुत ज्यादा है। जिन लुप्तप्राय प्रजातियों की आबादी शिकार और अवैध व्यापार जैसी गतिविधियों से कम हो रही है, उनमें जूनॉटिक वायरसों की संख्या अधिक होने की संभावना है। रिसर्चरों का कहना है कि वन्य जीवों के शोषण और उनके अवैध व्यापार से मनुष्य और वन्य जीवों के बीच नजदीकियां बढ़ती हैं और इससे वायरस ट्रांसफर के मौके भी बढ़ते हैं। जलवायु परिवर्तन और वन्य जीवन की भूमिका के बारे में समाज में जागरूकता की कमी से समस्या गंभीर हो गई है। प्राकृतिक वास और भोजन के अभाव में जंगली जानवर इधर-उधर भाग रहे हैं। इन स्थितियों में मनुष्य के साथ उनका संपर्क बढ़ रहा है। स्तनपायी जीवों की कम से कम 90 प्रतिशत प्रजातियों के वायरसों के बारे में समुचित जानकारी नहीं होने से समस्या और विकट हो गई है। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में आगाह किया है कि अगर हमें भविष्य में कोरोना जैसी महामारियों से बचना है तो सबसे पहले हमें अपने पर्यावरण की सेहत का ध्यान रखना पड़ेगा।

                                                                                          मुकुल व्यास

(उपरोक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं)