नए साल में नयी व्यवस्था से बदलाव संभव !


एक नए साल और दशक के पहले दिन मन में पहला ख्याल यह आता है कि हम क्या-क्या लेकर आगे जा रहे हैं। एक व्यक्ति ही नहीं, देश के संदर्भ में भी यह प्रश्न उठता है। बीता दशक भारी बदलावों के लिए याद किया जाएगा, खासकर प्रशासनिक कामकाज के स्तर पर।

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले और दूसरे कार्यकाल के शुरुआती छह महीनों में कुछ नई संस्थाएं बनाईं तो कुछ का रूप बदल दिया। इसके पीछे सरकार का तर्क यह था कि वह कामकाज की जड़ता को तोड़कर एक नई कार्य संस्कृति विकसित करना चाहती है। वह चाहती है कि नौकरशाही की जटिलता समाप्त हो, त्वरित फैसले हों और जनता को इसका लाभ मिले।

इस दृष्टि से सरकार ने योजना आयोग को भंग करके उसकी जगह नीति आयोग गठित किया। कहा गया कि योजना आयोग ऊपर से योजनाएं थोपता रहा है जबकि नीति आयोग ग्राम स्तर से योजनाएं बनाकर ऊपर तक पहुंचाएगा। आरबीआई के कामकाज में तब्दीली के लिए सरकार ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) का गठन किया।

सरकार के मुताबिक, इसका उद्देश्य ब्याज दर निर्धारण को अधिक उपयोगी और पारदर्शी बनाना है। नौकरशाही में सुधार के मकसद से सरकार ने विभिन्न विषयों पर सचिवों के आठ समूहों का गठन किया और फिर सिविल सेवा में लैटरल एंट्री का प्रावधान किया जिसके जरिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को विभिन्न मंत्रालयों में सीधे संयुक्त सचिव के रूप में नियुक्त किया गया।