11 से 20 जनवरी तक...

गाँधी शिल्प बाजार में प्रदेश एवं देश के शिल्पी लेंगे भाग 


ग्वालियर स 04 जनवरी 2020 स 11 जनवरी से 20 जनवरी 2020 तक मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम भारत सरकार के सहयोग से गाँधी शिल्प बाजार का आयोजन दस्तकारी हाट शिल्प बाजार मेला परिसर ग्वालियर में किया जायेगा। जिसमें प्रदेश एवं देश के शिल्पी भाग लेंगे।

हथकरघा एवं हस्तशिल्प मध्यप्रदेश शासन के आयुक्त राजीव शर्मा ने उक्त आशय की जानकारी देते हुए बताया कि गाँधी शिल्प बाजार के माध्यम से प्रदेश एवं देश के दस्तकारों एवं कलाकारों को बाजार उपलब्ध कराने के साथ उनकी कला का संरक्षण करना है।

श्री शर्मा ने बताया कि ग्वालियर संगीतए संस्कृति एवं कला का हमेशा से केन्द्र रहा है। उन्होंने कहा कि स्टोन क्राफ्ट की दृष्टि से प्रदेश को पहचान मिली है। प्रदेश के खजुराहोए मितावलीए पड़ावली के मंदिर या सांची के स्तूप में स्टोन क्राफ्ट का कार्य किया गया है।

उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में शिल्पए पत्थरए पीतलए बुनकरए लौहारए कास्टकलाए सेरोमिकए टेरीकोटा जैसी शिल्प कलाओं को संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में हस्तशिल्प विकास निगम द्वारा कार्य किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि प्रदेश में पत्थरों के दरवाजेए पिलर एवं खम्बे भी लोग आसानी से खरीद सकेंए इसके लिए शोरूम भी शुरू किया जा रहा है। इस कला के माध्यम से शिल्पियों को रोजगार भी मिलेगा। उन्होंने बताया कि शिल्पियों के लिए गाँधी शिल्प बाजार में 70 निरूशुल्क स्टॉल आवंटित किए गए हैं।

प्रत्येक शिल्पी को 300 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से डीए की राशि भी दी जायेगी। इन शिल्पयों में अनुसूचित जातियों के शिल्पियों को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में मिट्टी के दीपक जलाकर दीपोत्सव का आयोजन किया गया। हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम द्वारा 365 दिनों में से 300 दिन गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है।

बुनकरों और शिल्पियों के कारोबार को मिली नई पहचान
प्रदेश में कुटीर और ग्रामोद्योग को आर्थिक रूप से सशक्त और लोकप्रिय बनाने के लिये राज्य सरकार ने सत्ता संभालते ही शिल्पियोंए ग्रामीण कारीगरों और हुनरमंद कलाकारों को प्रोत्साहित करना शुरू किया है। शिल्प कलाओं से जुड़े ग्रामीण कई वर्षों से जीविका में कोई नया आयाम नहीं जुड़ने से निराश और हताश थे।

सरकार ने इन्हें बढ़ावा देकर आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की पहल की।पिछले एक वर्ष में राज्य सरकार ने अपने वचन.पत्र के कुटीर एवं ग्रामोद्योग संबंधी सात वचन पूरे किये हैं। शेष सात वचन पूरा करने की कार्यवाही शुरू की गई है।

प्रदेश में हाथकरघाए हस्तशिल्प एवं माटी कला शिल्प के उत्कृष्ट शिल्पियों को प्रतिवर्ष पुरस्कार दिए जाना शुरू किया गया है। पुरस्कार राशि को दोगुना कर क्रमशरू एक लाखए 50 हजारए 25 हजार के स्थान पर 2 लाखए एक लाख और 50 हजार रूपए के प्रथमए द्वितीय और तृतीय पुरस्कार देने का निर्णय क्रियान्वित किया गया।

मृगनयनी विक्रय केन्द्रों से जुड़े राष्ट्रीय फैशन संस्थान के विद्यार्थी
राज्य सरकार ने कार्यकाल के पहले साल में ही मृगनयनी एम्पोरियम से राष्ट्रीय फैशन संस्थान के विद्यार्थियों को जुड़ने का अवसर दिया। इस योजना में संस्थान के विद्यार्थियों द्वारा बुनकरों के लिए कोई डिजाइन विकसित की जाती हैए तो उसे उपभोक्ता को क्रय करने के लिए उपलब्ध कराते हुए प्राप्त राशि में से 2 से 5 प्रतिशत तक राशि रायल्टी के रूप में विद्यार्थियों को देने का निर्णय लागू किया। छत्तीसगढ़ और आन्ध्रप्रदेश के साथ अनुबंध कर प्रदेश के हाथकरघा एवं हस्तशिल्प उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराया गया।

शिल्पियों के लिये प्रशिक्षण और मार्केटिंग
पत्थर शिल्प के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए छतरपुरए मुरैनाए ग्वालियर और जबलपुर जिले के शिल्पियों को प्रशिक्षण और मार्केटिंग की सुविधा दी गई।

द रॉयल हेरिटेज कलेक्शन
मृगनयनी विक्रय केन्द्रों से पहली बार चंदेरी एवं महेश्वर के बुनकरों को उच्च श्रेणी और गुणवत्ता के वैवाहिक वस्त्रों के उत्पादन और विपणन के लिए प्रोत्साहित किया गया। फलस्वरूप देश के वैवाहिक साड़ियों के बाजार में मध्यप्रदेश के बुनकरों द्वारा बनाये गये वस्त्रों के श्द रॉयल हेरिटेज कलेक्शनश् नाम से वस्त्र को स्थान मिला है। होशंगाबाद एवं बैतूल में नए मृगनयनी विक्रय केन्द्र शुरू किये गये। आन्ध्रप्रदेश के हैदराबादए गुजरात के केवडिया और छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में भी मृगनयनी शो.रूम शुरू किये गये।

भोपाल के गौहर महल के साथ अर्बन हाट इंदौर और शिल्प बाजार ग्वालियर में नई गतिविधियाँ प्रारंभ की गईं। उत्पादों की ब्रांडिंग के लिए भोपाल एवं इंदौर विमानतल पर मृगनयनी काउन्टर प्रारंभ करने की योजना बनाई गई। गौंड कलाकारों की कलाकृतियों को देश में मृगनयनी केन्द्रों में विक्रय के लिए उपलब्ध कराया गया।

ब्रांड बिल्डिंग
प्रदेश के हाथकरघा एवं हस्तशिल्प उत्पादों की ब्रांडिंग के लिये नई ब्रान्ड बिल्डिंग योजना शुरू की गई। इस योजना में पूर्व के 50 लाख रूपए के प्रावधान को कई गुना बढ़ाकर 9ण्80 करोड़ किया गया। ग्वालियर के कालीन पार्क में 20 हाथकरघे स्थापित कर बुनकरों को रोजगार दिया गया।

योजना में 120 नवीन करघे स्थापित करने का प्रावधान किया गया। शासकीय विभागों से 1281 लाख से ज्यादा राशि के क्रय आदेश प्राप्त हुएए जिनसे 1704 बुनकरों को सीधे रोजगार मिला। एक वर्ष में महेश्वरए चंदेरी सहित प्रदेश के 280 बुनकरों को डिजाईन विकास का प्रशिक्षण दिया गया। दोना.पत्तल एवं कागज के बैग तैयार करने वाले शिल्पियों को प्रशिक्षण देकर रोजगार प्रदान किया गया।

मृगनयनी एम्पोरियम का पीपीपी मोड पर संचालन
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 150वें जयंती वर्ष के विशेष अवसर पर खादी उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देने के लिए पीण्पीण्पीण् मोड पर एम्पोरियम संचालित करने का निर्णय लेकर उसे लागू किया गया। होशंगाबादए खंडवाए गुनाए सतनाए शहडोल और सागर में इस दिशा में कार्यवाही प्रचलन में है।

छिंदवाड़ा में पीपीपी मोड में एम्पोरियम का संचालन शुरू किया गया। दिसंबर 2018 से अक्टूबर 2019 की अवधि में 480 हितग्राहियों को ब्यूटी पार्लरए कम्प्यूटरए टेली एकाउण्टए इलेक्ट्रिशियनए दोना.पत्तलए चर्म सामग्री निर्माण आदि रोजगार मूलक क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया गया।

निजी क्षेत्रों में रेशम उत्पादन को बढ़ावा
निजी क्षेत्र में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये श् ई.रेशमश् पोर्टल शुरू किया गया । इसके माध्यम से मलबरी हितग्राहियों के चयनए पंजीकरण और भुगतान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया गया। चयनित कृषकों को अनुबंध के प्रावधानों के अनुसार पौध.रोपणए कृमि पालनए भवन निर्माण और सिंचाई संबंधी सहायता प्रदान करने के लिए पोर्टल पर भुगतान आदेश की व्यवस्था भी की गई।

छिंदवाडा और इंदौर में उन्नत किस्म के धागे तैयार करने के लिये उपकरण स्थापित किये गये। नरसिंहपुर और बैतूल जिले में रेशम धागाकरण की ऑटोमैटिक रीलिंग मशीन स्थापना की कार्यवाही की गई। किसानों से खरीदे जाने वाले रेशम ककून का समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया।

किसानों की भूमि पर 180 एकड़ मलबरी पौध.रोपण का कार्य किया गया। एक वर्ष में 256 लाख रुपये मूल्य के ककूनए धागा और रेशम वस्त्रों का विक्रय किया गया। रेशम गतिविधियों में तेजी से 10 हजार से अधिक हितग्राही लाभान्वित हुए। मात्र एक साल में 7ण्166 लाख किलो मलबरी ककून और 74 लाख 26 हजार टसर कोया का उत्पादन हुआ। इस दौरान माटी कला शिल्पियों को भी पुरस्कृत किया जाना शुरू किया गया।