G News 24 : जम्मू-कश्मीर में 4,200 से अधिक किताबों को लाइब्रेरी से हटाने और 25 प्रमुख पुस्तकों पर लगा बैन !

 विधानसभा से लेकर हाई कोर्ट तक छिड़ी महाजंग...

जम्मू-कश्मीर में 4,200 से अधिक किताबों को लाइब्रेरी से हटाने और 25 प्रमुख पुस्तकों पर लगा बैन ! 

जम्मू-कश्मीर में सरकारी लाइब्रेरी से हजारों किताबें हटाए जाने का मामला अब विधानसभा से लेकर हाई कोर्ट तक पहुंच गया है. इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयान के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया है. उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि मौजूदा व्यवस्था में चुनी हुई सरकार के पास किताबों पर रोक लगाने या हटाने का फैसला लेने का अधिकार नहीं है. हालांकि, विधानसभा में शिक्षा विभाग की ओर से दिए गए आंकड़ों के बाद विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं. मामला अब किताबों को हटाने, रिव्यू कमेटी की भूमिका, सरकार के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े सवालों के बीच फंस गया है.

करीब 22 लाख किताबों की हुई जांच

विधानसभा में अवामी इत्तेहाद पार्टी के विधायक शेख खुर्शीद के सवाल के जवाब में शिक्षा विभाग ने बताया कि जम्मू-कश्मीर में करीब 21,81,582 किताबों और दूसरे प्रकाशनों की जांच की गई. इनमें से 4,812 किताबों को लाइब्रेरी के सर्कुलेशन से हटा दिया गया. इनमें 518 ऐसी किताबों की प्रतियां थीं, जिनके 19 टाइटल पर पहले से S.O. 203 के तहत रोक लगी हुई थी. इसके अलावा 4,249 दूसरी किताबों में समीक्षा के दौरान आपत्तिजनक सामग्री मिलने की बात कही गई. आंकड़ों के मुताबिक, कश्मीर डिवीजन में 12,48,641 और जम्मू डिवीजन में 9,32,941 किताबों की जांच की गई.

उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?

किताबों पर रोक के सवाल पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि किताबों पर बैन होना चाहिए या नहीं, इस पर उनकी अपनी राय है. लेकिन मौजूदा व्यवस्था में चुनी हुई सरकार इस तरह के फैसले नहीं ले सकती. उन्होंने कहा कि अभी सरकार के पास इन मामलों में फैसला लेने का अधिकार नहीं है. व्यवस्था बदलने के बाद ही इस पर आगे कुछ किया जा सकेगा. मुख्यमंत्री के इसी बयान को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं. विपक्ष का कहना है कि विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए जवाब से यह साफ है कि हजारों किताबें सरकारी लाइब्रेरी के सर्कुलेशन से हटाई गई हैं.

शिक्षा मंत्री ने कहा, सरकार ने पहले ही कमेटी बनाई थी

शिक्षा मंत्री सकीना इटू ने विधानसभा में कहा कि सरकार ने किताबों की जांच के लिए पहले ही एक कमेटी बनाई थी. उन्होंने कहा कि कमेटी का काम किताबों की जांच करना है. सरकार का कहना है कि अगर ऐसी किताबों को जानबूझकर रोका जाता है, जिन्हें जम्मू-कश्मीर के लोग और बच्चे पढ़ना चाहते हैं, तो यह सही नहीं होगा.

AIP विधायक ने सरकार पर उठाए सवाल

AIP विधायक शेख खुर्शीद ने कहा कि उन्हें उनके सवाल का पूरा जवाब नहीं मिला. उनका कहना है कि उन्होंने किताबों के नाम, लेखकों और प्रकाशकों की जानकारी मांगी थी, लेकिन यह जानकारी नहीं दी गई. खुर्शीद ने मुख्यमंत्री के विधानसभा और मीडिया में दिए गए बयानों को लेकर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि सरकार को साफ करना चाहिए कि आखिर हजारों किताबें सरकारी लाइब्रेरी से क्यों हटाई गईं. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और बीजेपी जम्मू-कश्मीर में अपनी विचारधारा थोपना चाहते हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि चुनी हुई सरकार को भी इस मामले में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए.

PDP ने भी सरकार को घेरा

PDP विधायक आगा सैयद मुंतज़िर ने भी सरकार पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि 5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर के इतिहास और राजनीति को लेकर कई फैसले हुए हैं. उनका आरोप है कि बीजेपी जम्मू-कश्मीर के पुराने इतिहास को बदलना चाहती है और चुनी हुई सरकार को ऐसे मामलों में अपनी आवाज उठानी चाहिए. मुंतजिर ने कहा कि लोगों ने चुनी हुई सरकार को जनादेश दिया है. ऐसे में सरकार को विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए थी.

मामला हाई कोर्ट भी पहुंचा

किताबों को हटाने और उन पर रोक लगाने के फैसले को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि किताबों को लाइब्रेरी से हटाने की कार्रवाई संविधान में मिली आजादी से जुड़ी चिंताओं को जन्म देती है या नहीं. उनका कहना है कि किताबों के जरिए विचार लोगों तक पहुंचते हैं, इसलिए ऐसी कार्रवाई की संवैधानिक जांच जरूरी है.

तारिगामी ने कहा, विचारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती

CPIM नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने इस मामले में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े कई लेखकों और इतिहासकारों की किताबों पर पहले भी रोक लगाई गई है. तारिगामी ने कहा कि उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर इस मामले को हाई कोर्ट में उठाया है और अब अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार है. उन्होंने कहा कि किताबों और विचारों पर रोक लगाने का सिलसिला जारी नहीं रहना चाहिए. उनके मुताबिक, लोगों को क्या पढ़ना है और क्या जानना है, इस पर पाबंदी लगाना सही नहीं है.

BJP ने कार्रवाई का किया बचाव

बीजेपी ने किताबों को हटाने की कार्रवाई का बचाव किया है. विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने कहा कि जिन एजेंसियों ने किताबों पर रोक लगाई है, उन्होंने ऐसा किसी वजह से ही किया होगा. उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयान पर भी सवाल उठाया. शर्मा ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री कहते हैं कि फैसला उनके हाथ में नहीं है, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि जो चीजें उनके अधिकार में हैं, उनमें सरकार क्या कर रही है.

अब किन सवालों पर टिकी नजर?

किताबों पर बैन का यह विवाद अब तीन स्तर पर चल रहा है. पहला, विधानसभा में सरकार और विपक्ष के बीच इसे लेकर बहस. दूसरा, किताबों की जांच करने वाली कमेटियों की भूमिका. और तीसरा, हाई कोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई. फिलहाल अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है. वहीं विधानसभा में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस जारी है. ऐसे में आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि किताबों को हटाने की प्रक्रिया और उन पर लगी रोक को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं?

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