जनकताल 1864 में सिंधिया स्टेट के 5 दिवसीय होली उत्सव का गवाह बना था ...
"जनकताल " 160 साल पहले 5 दिवसीय रंगारंग होली उत्सव का प्रमुख केन्द्र हुआ करता था !
ग्वालियर। ग्वालियर शहर के छोर पर स्थित जनक ताल आज वीरान हो गया है। अब यहां हर तरफ सन्नाटा पसरा रहता है। एक्का दुक्का लोगों के सिवा कोई यहां झांकने तक नहीं आता, लेकिन असल में इस जगह का इतिहास अपने आप में बहुत खूबसूरत है। क्योंकि यहां सिंधिया राज घराने के महाराजा होली खेलने आते थे, जी हां कभी यह जगह रंग-बिरंगे रंगों से गुलजार हुआ करता था।
"अमरा पहाड़ी, बद्री विशाल मठ, गर गज के हनुमान, सौदागरो की मजार, आनंद पुर ट्रस्ट आश्रम, बालाजी धाम और भेलसे वाली माता तुलजा भवानी मंदिर जनकताल के आसपास बने हुए हैं"
जनकोजी राव शिंदे की याद में जयाजी राव शिंदे ने जनकताल का निर्माण कराया था, ग्वालियर के बहोड़ापुर इलाके में अमरा पहाड़ी की तलहटी में बना यह ताल रियासत काल में शिंदे शाही परिवार के 5 दिवसीय होली उत्सव का प्रमुख केन्द्र हुआ करता था।
1864 पहला होली उत्सव...
जनकताल में पहला 5 दिवसीय होली उत्सव सन 1864 मे आयोजित किया गया , इस दिन मीना बाजार लगाया गया था, 5 दिन चले होली उत्सव में शहर की नृत्यांगनाओं का डांस और 2000 लोगों के खानपान की व्यवस्था की गई थी। रियासत काल में जनकताल पर 5 दिवसीय होली उत्सव का सिलसिला कई वर्षो तक चलता रहा , ताल के बीचों बीच बने भवन पर पहुंचने के लिए राज परिवार नाव का इस्तेमाल किया करता था । महाराज बाड़ा से जनकताल तक रेड कार्पेट बिछाया जाता था, और राजा और राज परिवार यहां एक रंगारंग कार्यक्रम के साथ होली उत्सव में शामिल होने पहुंचता था । देश की आजादी के बाद जनकताल गणेश देवी की मुर्तियां विसर्जित करने के उपयोग किया जाने लगा ।
बैलगाड़ियों से ढोया जाता था गुलाल
एमपी का ग्वालियर कई ऐतिहासिक संपदाओं से घिरा है. राजा मानसिंह किले से लेकर मोती महल की इतिहास में अपनी जगह है. इन्हीं में से एक स्थान है जनक ताल. ये तालाब भले ही आज वीरान हो लेकिन कभी यह जगह रंगों से गुलजार हुआ करती थी. इसी तालाब पर सिंधिया स्टेट के महाराजा अपनी प्रजा के साथ होली खेलते थे. एक नजर डालिये ईटीवी भारत संवाददाता पीयूष श्रीवास्तव की इस खास रिपोर्ट पर..
सिंधिया राज घाराने का होली स्पॉट
पुरातत्व विभाग से रिटायर्ड और इतिहासकार लाल बहादुर सिंह सोमवंशी कहते हैं कि 'ग्वालियर एक ऐतिहासिक शहर है. जो कई विरासतों को समेटे हुए है। यहां पर्यटन की दृष्टि से भी इसका बड़ा महत्व है. यहां सिंधिया राजघराने का वर्चस्व रहा है। सिंधिया राजा महाराजों को बहुत शौक हुआ करता था,परिवार के साथ जाकर कहीं त्योहार उत्सव मनाए।
बेहद सुंदर है जनक ताल की बनावट
ग्वालियर स्टेट के दौरान इस जनक ताल का निर्माण 200 वर्ष पूर्व जनकोजी राव सिंधिया ने कराया था। उन्हीं के नाम पर इसका नाम जनकताल पड़ा। इस ताल की बनावट भी बहुत सुंदर है। यहां पांच बारह दरियां हैं. जनक ताल के अंदर बारह दरी बनी हुई है। एक सीढ़ी बनी है। जिससे जनक ताल में उतरा जा सकता है।
बेलगाड़ियों से रंग और गुलाल और सभी सामान वहां ढोकर ले जाया जाता था...
स्थानीय इतिहासकार कहते है कि यहां होली खेलने के लिए जनकोजी राव सिंधिया आया करते थे। सिंधिया राज घराना यहां पांच दिनों तक रुका करता था। इस उत्सव में स्थानीय जागीरदार, राजा महाराजा सभी यहां रुकते थे। ये बताया जाता था, कि बेलगाड़ियों से रंग और गुलाल और सभी सामान वहां ढोकर ले जाया जाता था। बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ होली मनाई जाती थी। उस होली का बड़ा ही विहंगम दृश्य होता था।
बदल सकती जनकताल की तस्वीर...
आज जनक ताल दरियां तो बनी हुई है, लेकिन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। अगर उन पर थोड़ा ध्यान दिया जाये और आवागमन के साधन उपलब्ध हों।इसे पर्यटन विभाग अपने अन्तर्गत ले तो ये ग्वालियर के लिये एक बेहतरीन पर्यटनस्थल और पिकनिक स्पॉट बन सकता है, क्योंकि इस जगह का इतिहास और महत्व बहूत खूबसूरत रहा है।




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