जंतर-मंतर पर एक संगठन द्वारा जो गतिविधियाँ की जा रही हैं,उस संगठन की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए
नीट का विवाद समाप्त होने के बाद भी,आखिर अब क्यों चल रहा है यह आंदोलन !
जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन कई सवाल खड़े करता है। यदि जिन परीक्षार्थियों के नाम पर आंदोलन शुरू हुआ था, उनकी परीक्षा दोबारा हो चुकी है, परिणाम भी घोषित हो चुके हैं और अधिकांश विद्यार्थी अपनी शैक्षणिक प्रक्रिया में आगे बढ़ चुके हैं, तो फिर यह आंदोलन किसके लिए और किस उद्देश्य से जारी है?
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जंतर-मंतर पर छात्रों के नाम पर सक्रिय तथाकथित "कॉकरोच जनता पार्टी" आखिर है क्या? यदि यह कोई विधिवत पंजीकृत राजनीतिक दल है, तो उसका पंजीकरण किस प्रक्रिया के तहत हुआ, इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। और यदि ऐसा कोई वैधानिक पंजीकरण नहीं है, तो यह भी जांच का विषय है कि छात्रों के नाम पर किस संगठन और किस उद्देश्य से राजनीतिक गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन विरोध के नाम पर यदि किसी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा हो, तो उसकी पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किसी आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है, उसका वित्तीय स्रोत क्या है और उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।
नीट प्रकरण के बहाने जिस प्रकार लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई जा रही है, उसे केवल परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं देखा जा सकता। यह भी एक धारणा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में किए जा रहे बदलावों के कारण वैचारिक संघर्ष तेज हुआ है और उसी पृष्ठभूमि में यह राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है। यदि ऐसा नहीं है, तो आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को भी स्पष्ट करना चाहिए कि उनका लक्ष्य केवल परीक्षा सुधार है या उससे आगे कोई वैचारिक अथवा राजनीतिक उद्देश्य भी है।
भारत आज वैश्विक मंच पर तेजी से अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति मजबूत कर रहा है। ऐसे समय में यदि देश के भीतर ऐसे आंदोलन लगातार खड़े किए जाते हैं, जिनसे राष्ट्रीय संस्थाओं पर अविश्वास बढ़े, तो यह आवश्यक हो जाता है कि उनके पीछे कार्य कर रहे सभी संगठनों, वित्तीय स्रोतों और संरचनाओं की निष्पक्ष जांच हो। यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो जांच से किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
देश प्रश्न पूछ रहा है...
यदि मुद्दा समाप्त हो चुका है, तो आंदोलन क्यों जारी है? यदि संगठन वैधानिक है, तो उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए। और यदि छात्रों के नाम पर राजनीति हो रही है, तो उसका सच भी देश के सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन पारदर्शिता उससे भी बड़ा दायित्व है।
देश के युवाओं को भी यह समझना होगा कि उनका भविष्य किसी भी राजनीतिक प्रयोगशाला का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। छात्र आंदोलनों की गरिमा तब तक बनी रहती है, जब तक उनका उद्देश्य केवल छात्रों का हित हो। जैसे ही उनमें राजनीतिक स्वार्थ हावी होने लगते हैं, उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
छात्रों का भविष्य किसी भी राजनीतिक दल का चुनावी मंच नहीं है। शिक्षा के मुद्दों का समाधान सड़कों पर स्थायी टकराव से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, न्यायिक प्रक्रिया और नीतिगत सुधारों से निकलता है। लोकतंत्र में सवाल उठाना आवश्यक है, लेकिन हर सवाल का उत्तर भी तथ्यों और कानून की कसौटी पर ही तलाशना चाहिए।



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