G News 24 : सुप्रीम कोर्ट ने ने SIR पर विपक्ष के पॉलिटिकल फ्रॉड को खारिज कर दिया है !

 चुनाव आयोग के एक्शन को वैधानिक और संविधान सम्मत स्थापित कर दिया है ...

 सुप्रीम कोर्ट ने ने SIR पर विपक्ष के पॉलिटिकल फ्रॉड को खारिज कर दिया है !

कोर्ट ने विपक्ष के SIR विरोधी नेरेटिव पॉलिटिकल फ्रॉड को खारिज कर दिया है अब विपक्ष के ईकोसिस्टम ने सुप्रीम कोर्ट की आलोचना शुरू कर दी. कई एक्टिविस्ट तो यह कह रहे हैं, कि इस फैसले से चुनाव आयोग को जो ताकत मिली है, उससे लोकतंत्र कमजोर होगा. योगेंद्र यादव तो यहां तक कह रहे हैं कि इस फैसले के बाद वोटर सरकार नहीं चुनेंगे बल्कि सरकार तय करेगी कि वोटर कौन होगा. वोट चोरी का नेरेटिव भी इस फैसले के बाद ध्वस्त हो गया है.

अब यह फैलाया जा रहा है, कि एसआईआर की प्रक्रिया में जो छूट गए हैं, उनकी नागरिकता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इलेक्शन कमीशन मतदाता सूची में वोटर एडीशन या डिलीशन के लिए सीमित रूप से नागरिकता की पहचान संबंधी दस्तावेज जांचने का अधिकार रखता है. अदालत यह भी कह रही है, कि मतदाता सूची में नाम नहीं होने का मतलब नागरिकता समाप्त होना नहीं होता. 

जो भी नाम दस्तावेजों के अभाव में मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी पूरी सूची गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी. नियमों के मुताबिक नागरिकता का निर्धारण करने वाली कमेटी इस पर विचार करेगी. बंगाल में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के जो मामले ज्यूडीशियल कमीशन के सामने अपील में विचाराधीन हैं, उनको लेकर भी ऐसा झूठा नेरेटिव गढ़ा जा रहा है, कि चुनाव में इनको अवसर नहीं मिला है.  जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.

देश की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ है. विगत लोकसभा चुनाव में देश में कुल वोटर 97 करोड़ थे. इनमें से मात्र 64 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था. इसका मतलब है कि लगभग एक तिहाई मतदाताओं ने मतदाता सूची में होने के बाद भी अपने मताधिकार का उपयोग करने में रुचि नहीं दिखाई. 

विपक्षी दल और पॉलीटिकल एक्टिविस्ट भली भांति  जानते हैं, कि मताधिकार उपयोग करने या नहीं करने का नागरिकता से कोई संबंध नहीं है. सरकार की योजनाओं के लाभ से भी इनका कोई रिश्ता नहीं है. यह सब पॉलिटिकल फ्रॉड के रूप में जनता में अफवाह, भ्रम फैलाने के लिए नेरेटिव के रूप में गढ़े जाते हैं. 

पहले ईवीएम पर ऐसे ही सवाल खड़े किए जाते रहे, जब ईवीएम का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत में उस प्रक्रिया को सही ठहराया तब उस पर सवाल उठने कुछ कम हुए.

मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है. अगर यह आधार ही गलत होगा तो फिर निर्वाचन की पूरी प्रक्रिया अपने आप अशुद्ध हो जाएगी. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पहली बार नहीं हुआ है. पहले भी होता रहा है. भारत के नागरिक को ही चुनाव में वोट देने का अधिकार हो सकता है.

यह तकनीकी सवाल खड़ा रहता है कि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है. यह सही है लेकिन आयोग को मतदाता तय करने का पूरा अधिकार है और इस सूची में वही व्यक्ति शामिल हो सकता है जो भारत का नागरिक होगा. इसका मतलब है, कि मतदाता सूची में शामिल होने वाले व्यक्ति के उन दस्तावेजों को जांचना चुनाव आयोग की वैधानिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है जिससे यह पुष्टि हो सके कि वह भारत का नागरिक है.

SIR की प्रक्रिया पर जितनी राजनीति इस बार हुई है उतना पहले कभी नहीं हुई मतदाता सूची का शुद्धिकरण केवल चुनाव आयोग का ही दायित्व नहीं है. वह राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है. इस काम को चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के एजेंटों के माध्यम से ही करती है. उन्हें वैधानिक रूप से यह अधिकार दिया जाता है कि वह अपने बूथ एरिया में रहने वाले वास्तविक मतदाताओं को चिन्हित करें. उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज कराएं. 

ऐसे नाम जो मतदाता सूची में हैं, जो जीवित नहीं है, जो वह स्थान छोड़ चुके हैं, उनके नाम हटाए जाएं. कोई भी राजनीतिक दल अगर मतदाता सूची को लेकर चुनाव आयोग की नीयत और उसकी संवैधानिक शक्तियों को चुनौती देता है, तो वह उस राजनीतिक दल के निकम्मेपन और कमजोरी को ही दर्शाता है .

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में एसआईआर के समय लगी 20 याचिकाओं का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया है. याचिकाएं सभी प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा लगाई गई थीं. इसमें कांग्रेस समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, टीएमसी और अन्य याचिकाकर्ता शामिल थे. योगेंद्र यादव भी उसमें से एक याचिकाकर्ता थे. 

सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी विपक्षी दलों की ओर से  एक भी ऐसा मतदाता पेश नहीं किया जा सका जो यह साबित करे कि दस्तावेज होने के बाद भी उसका नाम हटाया गया.

दुर्भाग्यजनक है कि विपक्षी दल अपनी जीत पर तो चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष मानते हैं, लेकिन जहां उनकी हार होती है वहां चुनाव आयोग और निर्वाचन प्रक्रिया को संदिग्ध स्थापित करने की कोशिश करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का वर्डिक्ट सुप्रीम है. राजनीतिक दल और पॉलीटिकल एक्टिविस्ट कितना भी रोना रोएं, देश सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा करता है. चुनाव आयोग पर जितना अटैक किया गया, इस फैसले के बाद उसकी प्रतिष्ठा में उतना ही निखार आएगा. राहुल गांधी खुद तो सुप्रीम कोर्ट गए नहीं लेकिन फैसले के बाद भी वह वोट चोरी के नेरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. 

सीनाजोरी से सियासत नहीं चलती. संविधान की किताब हाथ में लेकर सुप्रीम कोर्ट और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल संवैधानिक पराजय ही कही जाएगी. हार-जीत से बड़ी देश के लोकतंत्र की बुनियाद है. इसको कमजोर करने के मुद्दे नेता को ही कैसे और कब कमजोर कर देते हैं उसे पता ही नहीं चलता.

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