जब फैसले कानून नहीं,परिस्थितियां होने लगें...
विशिष्ट या अति विशिष्ट व्यक्तियों के मामले में,न्याय के तराजू का प्रभाव वाला पलड़ा भारी !
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्याय व्यवस्था होती है। यही वह स्तंभ है जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है और सत्ता को सीमाओं में रखता है। लेकिन जब इसी स्तंभ में दरारें दिखने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या न्याय अब भी निष्पक्ष है, या फिर वह भी प्रभाव और परिस्थितियों के आगे झुकने लगा है?
आज जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, वे चिंता पैदा करती हैं। यदि कोई आरोपी यह तय करने लगे कि उसका मामला किस न्यायाधीश के सामने पेश हो, तो यह केवल प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं, बल्कि न्याय की आत्मा पर चोट है। न्यायालय की गरिमा इस बात में है कि मामलों का आवंटन निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो, न कि किसी की सुविधा या रणनीति के अनुसार।
और इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब बनती है, जब न्यायाधीशों के फैसले ही बदलने लगें, वह भी ऐसे मामलों में जहां बाहरी दबाव या प्रलोभन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। न्याय की स्थिरता ही उसकी विश्वसनीयता है। यदि फैसले परिस्थितियों के साथ बदलने लगें, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर न्याय किस आधार पर दिया जा रहा है, कानून के अनुसार या प्रभाव के अनुसार?
हाल के कुछ चर्चित मामलों- जैसे अरविंद केजरीवाल से जुड़े मामले में केजरीवाल कहते हैं कि उन्हें आमुख जज के कोर्ट में अपना केस नहीं लड़ना है ! इसी प्रकार दूसरा मामला उसे समय सुर्खियां बटोर लेता है जब राहुल गांधी की विदेशी नागरिकता के मामले की सुनवाई करने वाले जज साहब अपने ही दिए गए फैसले को पलट देते हैं ! उसके बाद 8 दिन तक कोर्ट में इस केस को लेकर सुनवाई होती है और फिर जज की तरफ से मात्र एक सेंटेंस' यह केस उनके कार्य क्षेत्र के दायरे में नहीं आता है ' बोलकर मामला ही सुलटा देते हैं!
अब फिर वही प्रश्न उठता है कि जब उनके कार्य क्षेत्र में यह कैसे नहीं आ रहा तो फिर 8 दिन तक वह इस केस की सुनवाई क्यों कर रहे थे, क्यों फरियादी से सबूत मांगे जा रहे थे और उन सबूत का क्या जो फरियादी ने कोर्ट में पेश किये ? यह घटना कोई साधारण घटना नहीं है 8 दिन तक लेकर उठे प्रश्न ने इस बहस को और तेज कर दिया है। इन मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के उतार-चढ़ाव और निर्णयों में बदलाव ने आमजन के मन में कई तरह के संदेह पैदा किए हैं। यह संदेह केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।तमाम सारे प्रश्न है जो इन दोनों न्याय व्यवस्था पर उठ रहे हैं इसके पीछे क्या कारण है ?
यह भी सच है कि न्यायपालिका एक जटिल और बहुस्तरीय प्रणाली है, जहां अपील, पुनर्विचार और समीक्षा जैसी प्रक्रियाएं मौजूद हैं। लेकिन इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य न्याय को और अधिक सटीक बनाना है, न कि उसे अस्थिर या संदिग्ध बनाना। जब यही प्रक्रियाएं सवालों के घेरे में आ जाएं, तो समस्या गहरी हो जाती है।
आम नागरिक के लिए न्यायालय आखिरी उम्मीद होती है। जब प्रशासन विफल होता है, जब राजनीति पक्षपाती दिखती है, तब न्यायपालिका ही वह स्थान है जहां व्यक्ति निष्पक्षता की उम्मीद करता है। लेकिन यदि वहीं पर पारदर्शिता और स्थिरता पर सवाल उठने लगें, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ने लगती है।
इस स्थिति में जरूरी है कि न्यायपालिका न केवल निष्पक्ष रहे, बल्कि निष्पक्ष दिखे भी। केस आवंटन की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जाए, न्यायाधीशों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, और ऐसे किसी भी संदेह को तुरंत दूर किया जाए जो न्याय की छवि को धूमिल करता हो।
अंततः, न्याय केवल दिया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। क्योंकि जब जनता का विश्वास डगमगाता है, तो कानून की किताबें नहीं, बल्कि अराजकता की आशंकाएं मजबूत होती हैं। लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि न्याय का तराजू हमेशा संतुलित रहे, न कि किसी प्रभाव के पलड़े में झुका हुआ।


0 Comments