हिंदू एकता का नारा और जमीनी सच्चाई...
आपकी पहचान यदि पहले जाति,समाज है और बाद में हिंदू, तो फिर एकजुटता की बात बे-मानी है !
देश का शीर्ष नेतृत्व जब “हिंदू एकता” की बात करता है, तो उसका आशय केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक एकजुटता से होता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कथन— “बटेंगे तो काटेंगे, एक रहेंगे तो नेक रहेंगे”—इसी व्यापक सोच का प्रतीक है। यह संदेश साफ है कि विभाजन की राजनीति अंततः समाज को कमजोर करती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संदेश सत्ता के गलियारों से निकलकर जमीनी राजनीति में उसी ईमानदारी से लागू हो पा रहा है?
हकीकत यह है कि कई क्षेत्रीय नेता, खासकर वे जो सत्ता से बाहर हैं या जिन्हें संगठन अथवा सरकार में अपेक्षित भूमिका नहीं मिली, अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए उसी हिंदू समाज को खांचों में बांटने का काम कर रहे हैं, जिसकी एकता की दुहाई ऊपर से दी जा रही है। वोट मांगने के समय ये नेता हर दरवाजे पर पहुंचते हैं, हर वर्ग से संवाद करते हैं, लेकिन जैसे ही “कद” और “रुतबे” की बात आती है, ये अपनी ही बिरादरी या जाति के नाम पर सीमित सामाजिक आयोजन करने लगते हैं।
यह प्रवृत्ति सिर्फ एक राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि हिंदू एकता के विचार पर सीधा प्रहार है। जब समाज को बार-बार यह संदेश दिया जाता है कि आपकी पहचान पहले जाति है, समाज है, और बाद में हिंदू—तो फिर एकजुटता का भाव कैसे पनपेगा? क्या ऐसे आयोजन और बयान अनजाने में ही सही, हिंदू समाज को भीतर से कमजोर नहीं कर रहे?
विडंबना यह है कि जिन अल्पसंख्यक पंथों या मजहबों का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, वहां भी समाज और वर्ग मौजूद हैं। लेकिन संकट की घड़ी में या अपने धर्म पर सवाल उठने पर वे आंतरिक भेद भूलकर एकजुट दिखाई देते हैं। वहां जातीय या सामाजिक श्रेष्ठता की सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा कम नजर आती है। इसके उलट हिंदू समाज में अक्सर देखा जाता है कि बाहरी चुनौती से पहले आंतरिक खींचतान शुरू हो जाती है—एक-दूसरे की टांग खींचने का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता।
यह स्थिति केवल राजनीति की देन नहीं है, लेकिन राजनीति इसे हवा देने का काम जरूर करती है। कुछ नेता जानते-बूझते हिंदुओं को जातियों और उप-समाजों में बांटकर अपना सीमित वोट बैंक सुरक्षित रखना चाहते हैं। इसलिए अपने स्टाफ में भी अपने समाज व जाति के लोगों को रखना पसंद करते हैं। अपने व अपने समाज के अल्पकालिक लाभ के लिए, ये देश हित को नजरअंदाज करके बड़े दीर्घकालिक सामाजिक विघटन को जन्म देने का काम भी करते हैं। परिणामस्वरूप “हिंदू एकता” एक नारे से आगे नहीं बढ़ पाती, और जमीनी हकीकत में बिखराव जस का तस बना रहता है।
असल जरूरत आत्ममंथन की है। यदि हिंदू समाज को सच में एकजुट देखना है, तो नेतृत्व को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवहार में भी एकता दिखानी होगी। जाति-विशेष के आयोजनों की जगह समावेशी सामाजिक कार्यक्रम, साझा मुद्दों पर संवाद और समान मंचों का निर्माण समय की मांग है।
हिंदू एकता का अर्थ जातियों के अस्तित्व को नकारना नहीं, बल्कि उन्हें व्यापक सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़ना है। जब तक राजनीति व्यक्तिगत कद और तात्कालिक लाभ से ऊपर उठकर इस सच्चाई को नहीं अपनाएगी, तब तक “एक रहेंगे तो नेक रहेंगे” का संदेश अधूरा ही रहेगा - दिव्या सिंह










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