G NEWS 24 : पीड़ा से मिली प्रेरणा ने गोपाल को बनाया गोबर शिल्पी

जो निराश्रित गौवंश कभी असहनीय पीड़ा का कारण बना था...

पीड़ा से मिली प्रेरणा ने गोपाल को बनाया गोबर शिल्पी

ग्वालियर। जो निराश्रित गौवंश कभी गोपाल झा के जीवन में असहनीय पीड़ा का कारण बना था, आज वही गौवंश उनके जीवन की पहचान, आजीविका और सामाजिक उद्देश्य का आधार बन गया है। गोपाल झा ने अपने निजी दुख को सकारात्मक सोच और नवाचार में बदलते हुए यह साबित कर दिया कि यदि दृष्टि सही हो, तो संकट भी अवसर बन सकता है। पिछले 15 सालों से गोबर शिल्पकला से अच्छी खासी आय अर्जित कर रहे गोबर शिल्पी गोपाल झा ने नाबार्ड की मदद से ग्वालियर व्यापार मेले के शिल्प बाजार में अपनी दुकान लगाई है। ग्वालियर शहर के घासमंडी क्षेत्र के निवासी गोपाल झा की सफलता की दास्तां संघर्ष और आत्ममंथन से जन्मी एक प्रेरणादायी यात्रा है। वे भावुक होकर बताते हैं कि वर्ष 2009 में एक निराश्रित गौवंश द्वारा गिरा दिए जाने से उनके पिता नाथूराम झा का निधन हो गया था। 

इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया और कुछ समय के लिए उनके मन में गौवंश के प्रति नकारात्मक भाव आ गए। लेकिन जब उन्होंने गहराई से सोचा, तो यह समझ आया कि दोष गौवंश का नहीं, बल्कि उसे सड़कों पर निराश्रित छोड़ने वाले समाज का है। यहीं से उन्होंने ठान लिया कि गौवंश के पंचगव्य को वे आय का जरिया बनाएंगे। गोपाल झा की फर्म “श्री कामधेनु इंटरप्राइजेज” के नाम से पंजीकृत है। मेले के शिल्प बाजार में उनकी दुकान पर सजे गौवंश के गोबर व पंचगव्य से निर्मित गुल्लक, कलात्मक मटकियां, सजावटी तोरण-द्वार, दीवार झूमर, शील्ड, की-रिंग होल्डर, दीपक एवं दीवार घड़ी के फ्रेम इत्यादि गोबर शिल्प उत्पाद  दूर से ही सैलानियों को आकर्षित कर रहे हैं। इस काम की शुरुआत आसान नहीं थी। 

गोपाल झा बताते हैं कि पहले उन्होंने घर पर ही गोबर से छोटे-छोटे शिल्प उत्पाद बनाना शुरू किया। समय लगा, प्रयोग हुए, गलतियां भी हुईं। लेकिन मेहनत रंग लाई और वे धीरे-धीरे कुशल गोबर शिल्पी बन गए। उनके हुनर को पहचान तब मिली, जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में सरकार द्वारा स्थापित “सेंटर फॉर एग्री बिजनेस इक्यूबेशन एंड इंटरप्रेन्योरशिप” में उनकी फर्म का पंजीयन हुआ। इस पंजीयन ने उनके शिल्प को नया बाजार दिया और आमदनी के रास्ते खोल दिए। गोपाल झा के उत्पाद विभिन्न मेलों और मंचों पर पहुंच रहे हैं। सरकारी सहयोग से संचालित गौशालाओं में उन्हें गोबर शिल्प का प्रशिक्षण देने का अवसर भी मिलता है। 

इसके अलावा शादी-विवाह और अन्य मांगलिक आयोजनों में गोबर शिल्प से सजावट का काम कर वे अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। इसी आय से उनका परिवार सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर रहा है। गोपाल झा कहते हैं, “गोबर शिल्प केवल हमारी आजीविका का साधन नहीं है, यह गौ संरक्षण का भी माध्यम है।” उनकी कहानी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि यदि सोच सकारात्मक हो और संकल्प मजबूत, तो एक पीड़ा भी समाज और स्वयं के लिए नई राह बना सकती है। गोपाल झा खुले में गौवंश को न छोड़ने की अपील करते हुए कहते हैं कि गौवंश केवल संवेदना का विषय नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आय का सशक्त माध्यम भी है। दूध ही नहीं, बल्कि पंचगव्य से भी सम्मानजनक रोजगार संभव है। उन्होंने इसे साकार करके दिखाया है।

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