इस दंगाई ने ही दिल्ली दंगों की पूरी पटकथा लिखी थी...
दंगाई और आतंकी उमर खालिद की रिहाई के लिए अमेरिका के 7 सांसदों ने लगाई गुहार !
नई दिल्ली/ग्वालियर। दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद की रिहाई को लेकर अमेरिका के सात सांसदों द्वारा भारत सरकार को पत्र लिखे जाने के बाद देश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। आलोचकों का आरोप है कि दिल्ली दंगों की कथित साजिश में शामिल रहे उमर खालिद के पक्ष में विदेशी सांसदों की यह पहल भारत की न्यायिक प्रक्रिया और संप्रभुता में हस्तक्षेप के समान है। आरोप है कि वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों की पूरी पटकथा पहले से तैयार की गई थी, जिसमें 27 लोगों की मौत हुई थी।
इन्हीं घटनाओं में आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की निर्मम हत्या भी हुई थी, जिसकी जांच और सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए कई संगठन उमर खालिद को दंगों का मुख्य आरोपी बताते रहे हैं। मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है। इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक विवाद तब और गहराया जब यह सामने आया कि जिन सात अमेरिकी सांसदों ने पत्र लिखा है, उनमें से चार सांसदों की तस्वीरें पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी हैं। इनमें इल्हान उमर, प्रमिला जयपाल, रशीदा तलैब और जॉन शाकॉस्की शामिल बताए जा रहे हैं।
विपक्षी दलों और आलोचकों का कहना है कि यह महज़ संयोग नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ कथित लॉबिंग का हिस्सा हो सकता है। आलोचकों का यह भी आरोप है कि राहुल गांधी विदेश दौरों के दौरान भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाते रहे हैं और अब उमर खालिद के समर्थन में अमेरिकी सांसदों की चिट्ठी उसी सिलसिले की एक कड़ी है। उनका कहना है कि जिन सांसदों का भारत की न्यायिक प्रक्रिया से प्रत्यक्ष सरोकार नहीं है, उनका इस तरह हस्तक्षेप करना गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
साथ ही, कांग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्व यूपीए सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा जा रहा है कि उस दौर में तथाकथित ‘भगवा आतंकवाद’ के सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए कई साधु-संतों, सैन्य अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को वर्षों तक जेल में रखा गया। आलोचकों का दावा है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित सहित कई लोगों को बिना ठोस प्रमाणों के लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझाए रखा गया। यहां तक कि कुछ पूर्व जांच अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर निर्दोषों को फंसाने के दबाव की बात भी सामने आई थी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत के आंतरिक और संवेदनशील मामलों में विदेशी नेताओं की दखलंदाजी स्वीकार्य है। साथ ही यह बहस भी तेज हो गई है कि देश की न्यायपालिका पर भरोसा रखने के बजाय अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिशें किस दिशा की राजनीति को दर्शाती हैं। अंततः, उमर खालिद का मामला न्यायालय में लंबित है और उसका निर्णय भारतीय कानून के तहत ही होना है। लेकिन इस प्रकरण ने राजनीति, कूटनीति और राष्ट्रहित को लेकर एक नई बहस को जन्म जरूर दे दिया है।









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