विरोधाभास-पीस का मुखौटा, सत्ता की साज़िश ...
ट्रंप द्वारा वेनेजुएला की सत्ता पर हमला और कब्जा, ट्रंप और नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत !
नोबेल शांति पुरस्कार की आकांक्षा रखने वाले डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला की सत्ता में हस्तक्षेप की खबरें वैश्विक राजनीति के उस कड़वे सच को उजागर करती हैं, जहाँ “शांति” अक्सर सिर्फ़ एक राजनीतिक ब्रांड बनकर रह जाती है। सवाल यह नहीं है कि हमला प्रत्यक्ष था या परोक्ष, सवाल यह है कि क्या सत्ता परिवर्तन के लिए दबाव, प्रतिबंध, सैन्य धमकी और गुप्त रणनीतियाँ शांति के दायरे में आती हैं?
ट्रंप प्रशासन का रिकॉर्ड बताता है कि “पीस” उनके लिए युद्ध-विराम नहीं, बल्कि अपने हितों के अनुकूल शांति है। ईरान पर प्रतिबंध, सीरिया में हस्तक्षेप, अफगानिस्तान में अधूरी शांति और अब वेनेजुएला—हर जगह एक ही पैटर्न दिखता है: पहले अस्थिरता, फिर नैरेटिव, और अंत में सत्ता संतुलन अपने पक्ष में। यदि यही शांति है, तो युद्ध किसे कहते हैं?
वेनेजुएला लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक विभाजन और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रहा है। लेकिन किसी भी संप्रभु देश की सत्ता को बाहरी ताक़तों द्वारा “डिज़ाइन” करना अंतरराष्ट्रीय क़ानून और लोकतांत्रिक मूल्यों—दोनों का अपमान है। लोकतंत्र यदि निर्यात की वस्तु होता, तो बंदूक की नोक पर नहीं आता; वह जनता की चेतना से उपजता है।
नोबेल शांति पुरस्कार का विचार युद्ध रोकने, मानवाधिकारों की रक्षा और संवाद को बढ़ावा देने के लिए था—न कि भू-राजनीतिक शतरंज में एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल होने के लिए। यदि शांति का रास्ता हमलों, प्रतिबंधों और सत्ता-हथियाने से होकर गुजरता है, तो यह पुरस्कार स्वयं अपने अर्थ को खो देता है।
इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या नैरेटिव गढ़कर हस्तक्षेप को वैध ठहराना पत्रकारिता है? क्या मानवाधिकार केवल वहीं दिखते हैं, जहाँ हित जुड़े हों? जब मानवीय संवेदना चयनात्मक हो जाए, तब शांति भी चयनात्मक हो जाती है।
आज दुनिया को ऐसे “पीस-मेकर्स” से सावधान रहने की ज़रूरत है, जिनकी शांति की परिभाषा सत्ता, संसाधन और प्रभाव से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती है। वेनेजुएला का संकट हमें याद दिलाता है कि शांति पुरस्कार से नहीं, नीति और नीयत से आती है। और जब नीयत पर सवाल हो, तो पुरस्कार की चाहत भी एक रणनीति भर बनकर रह जाती है।
शांति का सम्मान शब्दों से नहीं, कर्मों से होता है और कर्म यदि आक्रामक हों, तो मुखौटा कितना भी चमकदार क्यों न हो, सच्चाई सामने आ ही जाती है- रामवीर यादव










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