नहीं संभले तो होंगे बदतर हालात...

भारत समेत पूरी दुनिया में ली जा रही है कैंसर फैलाने की "सुपारी"

भारत समेत पूरी दुनिया में कैंसर फैलाने वाली "सुपारी" ली जा रही है। यह खुलासा द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में हाल ही में छपे एक लेख में हुआ है। इसके बाद देश और विदेश में सनसनी फैल गई है। लोगों में कैंसर फैलाने के पीछे भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है। सच्चाई छुपा कर लोगों से पैसे लेकर बदले में उन्हें कैंसर की सौगात दी जा रही है। यह सब कैसे संभव हो रहा है और लोग कैसे कैंसर के मुंह में जाने को मजबूर हैं....इस बारे में बता रहे हैं नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च, नोएडा के पूर्व निदेशक और देश दुनिया में कैंसर को लेकर बड़े स्तर पर काम करने वाले प्रो. डा. रवि मेहरोत्रा। डा. मेहरोत्रा कहते हैं कि ये हैरानी की बात है कि वर्ष 2022 में भी दुनिया के अधिकांश हिस्सों में चेतावनी लेबल के बिना नशीले कार्सिनोजेन को बेचना कानूनी बना हुआ है। 

सुपारी के रेशेदार बीज, जिसे आमतौर पर "सुपारी" के रूप में जाना जाता है, की खेती पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हजारों वर्षों से की जाती रही है। सुपारी को चबाया जाता है, लेकिन निगला नहीं जाता है। यह आम तौर पर मुख गुहा में रखा जाता है, जहां निकोटिनिक-एसिड-आधारित एल्कालोइड एस्कोलिन ट्रांसोरल रूप से अवशोषित होता है। लोग इस पदार्थ का उपयोग उत्तेजक प्रभाव के लिए करते हैं। यह सतर्कता को बढ़ाता है और कुछ में हल्का उत्साह पैदा करता है। हालांकि चबाने की आदतें अत्यधिक परिवर्तनशील होती हैं। सुपारी का सेवन अक्सर "क्विड" (दोहरे) के रूप में किया जाता है, जिसमें तंबाकू, बुझा हुआ चूना और एक पौधे की पत्ती होती है। अनुमानों के अनुसार, 2002 तक दुनिया भर में 600 मिलियन सुपारी उपयोगकर्ता थे, जिसने सुपारी को कैफीन, निकोटीन और अल्कोहल के बाद चौथी सबसे अधिक खपत वाली एरेकोलाइन बना दिया। विलियम जे मोस ने अपने लेख में उसका उद्धरण किया है।

इंटरनेशल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आइएआरसी) ने इसे समूह 1 मौखिक कार्सिनोजेन के रूप में वर्गीकृत किया है। सुपारी गैर-संक्रामक ओडोन्टोजेनिक रोग को बढ़ावा देती है और प्रणालीगत स्थितियों के साथ-साथ प्रतिकूल गर्भावस्था परिणामों को तेजी से बढ़ाती है। बहुत से सुपारी के उपयोगकर्ता इसे किशोरावस्था में ही लेना शुरू कर देते हैं, क्योंकि वह इसके दुष्प्रभावों से अंजान होते हैं। उन्हें इससे होने वाले मुंह के कैंसर के बारे में जानकारी की कमी होती है। इसका प्रमाण हाल के दशकों में पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में होने वाली सुपारी की हैरतअंगेज खपत और मुंह के कैंसर की बढ़ती घटनाएं हैं।

कैंसर पर काम करने वाले वैज्ञानिकों ने इस समस्या के बहुआयामी कारण बताए हैं। इनमें से सुपारी के उपयोग वाले क्षेत्रों में चिकित्सीय देखभाल की कमी प्रमुख कारक है। ऐसे क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएं सुपारी के उपयोग को बढ़ावा देती हैं। कम साक्षरता और प्रभावित आबादी के बीच चिकित्सा प्रणाली नहीं होना कैंसर के भय को बढ़ा रहा है। इसकी वजह यह भी है कि नीति निर्माताओं ने इन क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल को अपनाने की लगातार उपेक्षा की है। क्योंकि सुपारी का उत्पादन और उपयोग एक अरब डॉलर से अधिक का उद्योग है।

लेखकों के अनुसार पश्चिमी प्रशांत में स्थित एक दूरस्थ यू.एस. कॉमनवेल्थ है, जहां सुपारी स्थानिक है। सुपारी से संबंधित मुंह के कैंसर का बोझ जनसंख्या के आकार के अनुपात से काफी अधिक है। मुंह के कैंसर से पीड़ित बहुत से लोगों की स्वास्थ्य साक्षरता कम होती है। वे उपचार के लिए देर से आते होते हैं। इसलिए उनके परिणाम खराब होते हैं। वहां सुपारी बाजारों और कोने की दुकानों में व्यापक रूप से उपलब्ध है। विशेष रूप से सुपारी उत्पादों को बेचने वाली दो दुकानें हाल ही में मांग को समायोजित करने के लिए खोली गई हैं। यहां रेडियो पर भ्रामक विज्ञापन भी सुनने को मिलते हैं कि "क्या आप जानते हैं कि सुपारी चबाने में तंबाकू जोड़ने से आपके मुंह के कैंसर होने का खतरा बढ़ सकता है? आज ही तंबाकू मुक्त जीवन की दिशा में पहला कदम उठाने के लिए इस हॉटलाइन पर कॉल करें।…” निहितार्थ स्पष्ट है: आगे बढ़ो और सुपारी चबाते रहो, बस तंबाकू छोड़ो।

प्रो. डा. रवि मेहरोत्रा कहते हैं कि सुपारी की खेती और खपत में भारत दुनिया का सबसे अग्रणी देश है। हालिया आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1990 के दशक में अनुमानित 250,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष से बढ़कर 2020 में लगभग 900,000 मीट्रिक टन हो गया। इसकी मांग से अधिक होने से पिछले दो वर्षों में प्रति किलोग्राम सुपारी की कीमत दोगुनी से अधिक हो गई है। अन्य क्षेत्रों में जहां सुपारी स्थानिक है, खपत हाशिए पर और मजदूर वर्ग के समूहों के बीच केंद्रित है। ऐसे क्षेत्रों में कई लोग पहले बचपन या किशोरावस्था के दौरान सुपारी उत्पादों का उपयोग करते हैं। बॉलीवुड सितारे सुपारी उत्पादों का समर्थन करना जारी रखे हैं। यह भी इसकी खपत और उपयोग बढ़ने की एक प्रमुख वजह है। 

भारत के अलावा पूरे यूरोप और अमेरिका के एशियाई बाजारों में सुपारी की उपलब्धता बढ़ती जा रही है। इसकी राजनीतिक वजहें भी हैं। वहां ऐसे उत्पाद हमेशा सस्ते होते हैं। शहरी क्षेत्रों में खोजने में काफी आसानी से मिल जाते हैं। दूसरी बात यह कि आम तौर पर सुपारी उत्पाद किसी भी तरह की चेतावनी लेबल के साथ नहीं आते हैं। इसीलिए शायद प्रसिद्ध न्यूरोसाइंटिस्ट सैंटियागो रामोन वाई काजल ने 1899 में कहा था: "हर बीमारी के दो कारण होते हैं। पहला पैथोफिजियोलॉजिकल है और दूसरा राजनीतिक।

डा. रवि मेहरोत्रा कहते हैं कि वर्षों से एक कस्टम स्वीकृत पारंपरिक वस्तु होने के नाते, एरेका नट(सुपारी) उष्णकटिबंधीय ताड़ के पेड़ अरेका केचु का बीज दुनिया भर में अनुमानित 600 मिलियन उपयोगकर्ताओं के साथ व्यापक रूप से चबाया जाने वाला प्राकृतिक उत्पाद है, जो कि प्राथमिक वर्ग का कैंसर पैदा करने वाला एजेंट है। प्रसंस्कृत सुपारी की बिक्री और उत्पादन दुनिया भर में पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। एशिया प्रशांत क्षेत्र दुनिया में सुपारी का सबसे बड़ा बाजार है, जिसकी वैश्विक बाजार हिस्सेदारी 90% से अधिक है। वहीं भारत 58% से अधिक की बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा उत्पादक है। यह दुनिया में सुपारी का सबसे बड़ा उपभोक्ता और निर्यातक भी है।