इस बार तो बजट बनाने वालों को हलुआ भी नसीब नहीं हुआ…

बजट : विष रस भरा कनक घट जैसे

 

अर्थशास्त्र मेरा विषय नहीं है। हालांकि मै अर्थशास्त्र में स्नातक हूँ। अर्थशास्त्र में कमजोरी की वजह से मेरे घर की अर्थव्यवस्था भी हमेशा लचर रहती है। घर का बजट भी देश के बजट की भांति लोककल्याणकारी होते हुए भी हमेशा घाटे का ही साबित हुआ है ,इसलिए मै अक्सर देश के बजट पर प्रतिक्रिया करने से बचता हूँ ,लेकिन बच नहीं पाता। देश की वित्त मंत्री श्रीमती सीतारमण को बजट पेश करते हुए चौथी बार देखा तो प्रतिक्रिया लिखने से अपने आपको रोक नहीं पाया। सीता जी की विद्वता  असंदिग्ध है। वे जितनी बेरहमी से बजट बनाती हैं उसकी कोई दूसरी मिसाल मेरी नजर में नहीं है। एक महिला को बजट के मामले में निर्मम होना ही चाहिए अन्यथा मुश्किल हो जाती है।  

सीता जी ने जब वजीरे खजाना की हैसियत से अपना पहला बजट पेश किया था तब उनके बाल काले थे,धीरे -धीरे बजट के बोझ ने उनके सिर के बाल पका दिए और चौथे बजट के समय उनकी केशराशि   रजत थी और बजट कनक घट की तरह ,लेकिन कनक घट में से जब बूंदे छलकीं तो वे विष की तरह कड़वी लगीं। वजीरे खजाना के पास अपनादिल तो होता है लेकिन  दिमाग पर दबाब पार्टी के होते हैं। पार्टी के खाके में उन्हें रंग भरना पड़ता है। ऐसा वे अकेली नहीं करतीं हरेक दल के वजीरे खजाना को करना पड़ता है ,लेकिन होशियार वजीर कड़वाहट कम करने के लिए रस का स्वाद बदल लेते हैं। सीता जी इसमें इस बार नाकाम रहीं। उनकी एकमात्र कामयाबाई ये रही की उन्होंने कोरोनाकाल को अमृतकाल में बदल दिया ,जबकि इस काल में देश में पांच लाख से ऊपर लोग कालकवलित हुए थे। बजट दरअसल अंधों का हाथी है। हर वर्ग बजट में अपने लिए रहतें खोजता है।

जिसे मिल गयीं वो खुश और जिसे नहीं मिलीं वो नाखुश उसके लिए बजट 'शून्य ' जैसा होता है। पहले के बजट भाषण लम्बे होते थे ,उन्हें  सरस् बनाए रखने के लिए शेरो-शायरी होती रहती थी ,हंसी ठठ्ठा भी चलता था लेकिन जबसे सीता जी ने बजट का डिजटलाइजेशन किया है बजट आभासी हो गया है। बजट की प्रतियों से आने वाली खुशबू नदारद है और इस बार तो बजट बनाने वालों को हलुआ भी नसीब नहीं हुआ सो बजट विष से भी ज्यादा कड़वा हो गया। 90  मिनिट के बजट भाषण में महाभारत के एक श्लोक को जगह मिली  ,वो भी अंग्रजी में। सीता जी के चौथे बजट में प्रधानमंत्री समेत सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने कितनी बार  मजे थपथपायीं या सीता जी ने कितनी बार पानी पिया इसका जिक्र करने की जरूरत नहीं है ,क्योंकि बजट से जो अंतर्ध्वनियाँ उठना थीं वे कहीं थीं ही नहीं।  

सीता जी ने इतना गोलमाल और गरिष्ठ बजट पढ़ा कि किसी को ये पता ही नहीं चला कि उसके हिस्से में क्या आया और क्या नहीं ?पहले बजट में वजीरे खजाना अपनी पिटारी से एक-एक जिंस के बारे में ऐलान करते थे कि-' ये सस्ता हुआ और ये महंगा हुआ। इसी ऐलान पर छींटाकशी होती थी,और मजाक भी ,कविताएं भी पढ़ी जातीं थीं और शेर भी सुनाये जाते थे। बीते सात साल में सरकार जनता से बजट रस भी छीनती जा रही है। पहले आम बजट और रेल बजट अलग-अलग आता था। अब दोनों को एक कर दिया गया। पता ही नहीं चलता कि अब हमारी भारतीय रेल हैं भी या नहीं ?पहले बजट की प्रतियां हर संसद की टेबिल पर होतींथीं ,अब वे ईमेल पर भेजी गयीं हैं। बहुत से सांसद आज भी अपना कम्प्यूटर  नहीं खोल पाते वे बेचारे बजट का स्पर्श करने से भी वंचित कर दिए गए।

बजट को भी आभासी बना दिया। सीता जी के बजट की दूसरी खासियत ये रही कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने में पंचवर्षीय योजनाओं का हल्ला था लेकिन सीता जी ने अबकी पच्चीस वर्षीय बजट का हल्ला मचा दिया। बजट में अगले पच्चीस साल की योजनाएं शामिल की गयीं हैं। यानि वजीरे खजाना ये मानकर चल रहीं हैं कि अगले 25  साल तक देश के खजाने की चाबी भाजपा के पास ही रहने वाली है सीता जी खुद भी सपने देखती हैं और जनता को भी सपने दिखातीं हैं। यानि वे स्वप्नलोक   का बजट बनातीं हैं ,जो आँख खुलते ही अफ़साना जैसा लगने लगता है। मेरे हिसाब से बजट तो बजट होता है और अवाम को बजरबट्टू बनाने के लिए बनाया जाता है। बजट के हिसाब से आज तक कोई सरकार चली नहीं। हम भले ही 'जितनी चादर ,उतने पांव पसारिये' का मन्त्र अलापते हों लेकिन हमेशा हमारी सरकार के पांव चादर के बाहर ही झांकते नजर आते हैं।

सरकार अनुमानों पर चलती है और अनुमान तो अनुमान ठहरे,वे सही साबित होंगे इस बात की गारंटी कोई सरकार और उसका बजट नहीं लेता। ले भी नहीं सकता। लेना भी नहीं चाहिए। क्योंकि बजट बनाना और उसके अनुरूप देश चलना लगभग असम्भव सा काम है। कपिल शर्मा की याद मुझे बजट के समय अक्सर आती है ,क्योंकि इस बजट से किसी को कुछ मिला हो या मिला हो लेकिन बाबा जी का ठुल्लू अवश्य मिला है। किसानों ने ने जिन मुद्दों को लेकर एक साल तक आंदोलन किया था उसके बारे में बजट मौन रहा। बेरोजगारों के लिए 60  लाख नौकरियों की बात कही गयी किन्तु ये नहीं बताया गया की देश के उन 80  करोड़ परिवारों का क्या होगा जो कथित अमृतकाल में मुफ्त के अनाज पर ज़िंदा थे।

बजट में ये भी नहीं बताया गया कि क्रिप्टो  करेंसी से आमदनी की योजना बनाने के बजाय   उसे बंद क्यों नहीं किया गया,जबकि पहले इसे भ्र्ष्टाचार का सबसे बड़ा अस्त्र माना जा रहा था। आम बजट में वजीरे खजाना ने देश की जनता को ये भी नहीं बताया कि उसके रसोई की दयनीय दशा सुधरेगी या नहीं। वो जो मंहगाई की डाइन पूरे देश में तांडव मचाये हुए है उसका वध होगा या नहीं ?देश की आम जनता अरबों-खरबों के आंकड़ों से होने वाले नफा-नुक्सान को नहीं समझती,क्योंकि जनता ने अर्थशास्त्र में कोई डिग्री हासिल नहीं की होती। उसे आसान लफ्जों में बताना पड़ता है कि बजट में उसके फायदे का क्या है और क्या नहीं ?सीता जी ने तो आसान लफ्जों का इस्तेमाल किया और हिन्दुस्तान की किसी भाषा का ,वे आंग्ल भाषा में बजट पढ़तीं यहीं और ऊपर बैठे हमारे अटल जी ुनेहँ टुकुर-टुकुर ताकते रहते हैं। 

सीता जी का बजट देखकर न कोई दशरथ खुश   है और न राम। न लक्ष्मण खुश है ,न कौशल्या,न कैकेयी खुश है न मंथरा न भरत  खुश है न शत्रुघ्न। न वशिष्ठ जी खुश हैं और न सुमंत। बाकि नाखुश पात्रों का जिक्र मैंने जानबूझकर नहीं किया क्योंकि वे विधर्मी हैं जिन्हें हमारी सरकार और हमारे भाग्यविधाता अपना मानने में हिचकते हैं। हालाँकि ऐसे लोगों में हमारे गफूर मियाँ भी हैं और फरीदा बेगम भी ,क्रिस्टोफर भी हैं और जनरैल सिंह भी। यानि जो हिंदुस्तान में रहता है ये बजट सबको प्रभावित करता है। आपकी आप जानें। कुल जमा अमृतकाल में आये इस बजट के लिए सीता जी को बधाई।

- राकेश अचल