ओआईसी की बेजा बयानबाजी

 हिजाब पर हदें न लांघें ओआईसी !



भारत में कुछ स्कूलों-कॉलेजों में हिजाब पहनने को लेकर हुए विवाद पर बयान जारी कर 57 मुस्लिम बहुल देशों का एक ग्रुप ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) ने अपने तकाजों और सरोकारों को खुद ही सवालों के घेरे में ला दिया है। भारत सरकार ने ठीक ही तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए इसे न केवल 'गलत इरादों से प्रेरित' और 'गुमराह करने वाला' बताया बल्कि यह भी कहा कि ओआईसी सेक्रेटेरियट निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव में ऐसे बयान जारी कर खुद अपनी छवि को नुकसान पहुंचाता है।

पाकिस्तान के प्रभाव में यह अक्सर भारत के खिलाफ रुख दर्शाता रहता है। पिछले साल ही संयुक्त राष्ट्र महासभा की 76वीं बैठक के दौरान ओआईसी ने भारत से यह अपील कर दी थी कि जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को फिर से बहाल करे। तब भी भारत ने उसे हिदायत दी थी कि वह देश के आंतरिक मामलों में दखल देना बंद करे।

इस बार फिर उसने कर्नाटक में हिजाब को लेकर हो रहे प्रदर्शनों, हरिद्वार धर्म संसद में दिए गए बयानों और कई राज्यों में बनाए जा रहे कथित मुस्लिम विरोधी कानूनों को मुद्दा बनाने की कोशिश की है। लेकिन समझने की बात यह है कि भारत का अपना एक संविधान है, जो हर धर्म के नागरिकों को समान दृष्टि से देखता है। यहां स्वतंत्र न्यायपालिका है। अगर किसी प्रदेश के किसी स्कूल या कॉलेज में प्रशासन के फैसले से स्टूडेंट्स में नाराजगी भी है तो उन्हें अपनी नाराजगी व्यक्त करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। फैसले के विरोध में अदालत जाकर अपने संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का विकल्प भी हर नागरिक को उपलब्ध है। ऐसे ही अगर किसी धर्म संसद में कुछ लोगों ने आपत्तिजनक बयान दे दिए तो न केवल संबंधित लोगों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई के प्रावधान हैं बल्कि उन गलत बयानों का वैचारिक विरोध करने का अधिकार भी सभी नागरिकों के पास मौजूद है।

ओआईसी जैसा कोई संगठन जब ऐसे मसलों पर बयान जारी करता है तो वह न केवल एक देश के आंतरिक मामले में बेजा दखलंदाजी करने का दोष अपने सिर पर लेता है बल्कि अपनी दूषित मानसिकता का परिचय देते हुए अपने उद्देश्यों और इरादों को भी संदिग्ध बनाता है। शैक्षणिक संस्थानों का अपना एक ड्रेस को कोड होता है फिर ये नया विवाद क्यों ? क्या फ़ोर्स,पुलिस,उच्च प्रासनिक सेवा के दौरान हिज़ाब जैसा परिधान उचित होगा ? नौकरी के दौरान सबंधित विभागों के नियम कायदे मानना होते हैँ।  फिर  तरह के विवाद फिजूल  हैँ। ये मुद्दा सिर्फ और सिर्फ राजनीति से प्रेरित है  और कुछ नहीं !