जनता से टेक्स के रूप में मिले पैसे को बर्बाद करने में...

इन माननीयों को आखिर शर्म तो आती नहीं है !

दुनिया भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति कायल है क्योंकि भारत ही एक मात्र देष है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालन करता है जिसका कई देष अनुषरण भी करते हैं। लेकिन इस व्यवस्था को हमारे माननीय जिन्हें हमारे देषवासी ही चुनकर लोक सभा में भेजते हैं। विभिन्न राज्यों प्रांतो का प्रतिनिधित्व करने वाले ये माननीय(जनप्रति निधि) यूॅ तो स्वयं को जनता का सेवक अर्थात नौकर कहते हैं। लेकिन ये कितने बड़े जनसेवक होते हैं। आप और हम सभी भलीभांति जानते हैं। जो व्यक्ति चुनाव लड़ते समय जन-जन के द्वार-द्वार जाकर वोट (मतदान की गुहार मतदाता से हाथ जोड़ कर उसके पैर कर) मांगता है। वही नेता जब जन प्रतिनिधि चुन लिया जाता है तो फिर सभी जानते हैं कि किस प्रकार का व्यवहार उसी जनता के साथ करता है जिसने उसे अपना जनप्रतिनिधि चुना है। 

यहां तक तो कोई बात नहीं है लेकिन इन पर गुस्सा तब आता है जब यही माननीय जनता के मुद्दों को विधानसभा या लोक सभा या फिर राज्यसभा के सदनों में जिस तरीके से उठाते हैं जिस प्रकार से सदनों में मुद्दों की आड़ लेकर अपना राजनैतिक हित साधने का प्रयास करते हैं। और जब इन मन माफिक बात सदन में नहीं हो पाती है तो फिर हो हल्ला करना शुरू कर देते हैं। सदन का समय खराब करते हैं। इस हो-हल्ला और शोर’-षराबे के कारण जनता से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सवाल-जबाव हो ही नहीं पाते हैं। इस वजह से सदनों का समय तो खराब होता ही है इसके साथ इनको चलाने और इन माननीयों की व्यवस्थाओं पर जो पैसा खर्च होता है वह पैसा भी तो जनता से टैक्स के रूप में वसूला जाता है। 

जिससे इन सदनों को चलाया जाता है इन माननीयों की तनख्वा,इनकी सुरक्षा आवास आदि जैसी तमाम सुख-सुविधाओं पर खर्च का वहन किया जाता है। ऐसे में जब ये माननीय सदन को नहीं चलने देते हैं तो जो पैसे का नुकसान होता है क्यों न इन माननीयों की सैलरी से वसूला जाये। क्यों न इनकी सुख-सुविधाओं में कटौती की जाये। वैसे भी ये स्वयं को जनसेवक कहते है तो फिर इन जनसेवकों की भी ड्यूटी बनती है कि जनता के खून-पसीने की कमाई से टैक्स के रूप में प्राप्त पैसे को बर्बाद करने का कोई हक नहीं है। 

जितने दिन इनकी वजह से जितने दिन सदन की कार्रवाही में व्यवधान उत्पन्न होता है या सदन नहीं चल पाता है उतने दिन की सैलरी और सभी खर्च इन माननीयों की तनख्वा में से ही वसूल किया जना चाहिये। तब इन्हें अपनी जबावदेही और सदन की गरिमा का अहसास होगा। और फिर वैसे भी सेवक को सेवा के बदले सैलरी अथवा अन्य सुख-सुविधाओं की चाहत नहीं रखना चााहिये। जनता सेवा के बदले जो सेवक को दे उसी से संतुष्ट रहना चाहिये। सैलरी और सुख-सुविधाओं का लाभ उठाने वाले स्वयं को जनप्रतिनिधि तो कतई न कहें। क्यांेकि जनसेवक कभी सेवा के बदले सेवा षुल्क या सुविधा नहीं मांगता है और जो सेवा के वदले पैसा और सुविधा चाहता है वह सेवक नहीं नौकर होता है और नौकर को अपने मालिक के आदेष का पालन करना ही पड़ता है। यह बात इन माननीयों और इन्हें चुनने वाली जनता को भी समझ में आनी चाहिये। 

रवि यादव