पूरे देश में भाजपा के फांसीवाद को लेकर चिंता वहीँ ...

पंजाब में सरकार और पुलिस के भीतर फांसीवाद का नया वेरिएंट !

दुनिया इन दिनों नए-नए वायरसों और उनके वेरिएंट से हलकान है। जहां एक और पूरे देश में भाजपा के फांसीवाद को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है वहीं पंजाब में कांग्रेस सरकार और उसकी पुलिस के भीतर फांसीवाद का नया वेरिएंट प्रकट हुआ है ।  अब पंजाब की पुलिस प्रतिकार रोकने के लिए लाठी-गोली के बजाय अपनी आवाज बुलंद करने वालों के मुंह दबाने लगी है और वो भी राज्य के मुख्यमंत्री के सामने। 

इस आलेख के साथ आप जो ' कोलाज ' देख रहे हैं वो पंजाब में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की संगरूर रैली का है ।  इसी रैली में पंजाब के शिक्षक अपनी मांगों का विरोध करने के लिए नारेबाजी कर रहे थे। शिक्षकों की नारेबाजी से मुख्यमंत्री के भाषण में खलल न पड़े इसलिए पुलिस ने अधिकांश नारेबाज शिक्षकों को काबू में करते हुए उनके मुंह अपने हाथों से बंद कर लिए। विरोध रोकने का ये नया तरीका था इसलिए सभी का ध्यान इस और गया और यकायक तमाम कैमरों ने इस मुँहबन्दी को कैद कर लिया। 

पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी सामान्य किसान परिवार से आते हैं इसलिए उनके राज में पुलिस जनता की आवाज दबाने के लिए इस तरह की बेहूदगी करेगी इसकी कल्पना किसी को नहीं थी ।  सरकारें विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए अब तक लाठी,पानी,आंसूगैस और बंदूकों का सहारा लेतीं आयीं हैं। पहली बार किसी कांग्रेसी सरकार में पुलिस ने मुँहबन्दी का नया तरीका इस्तेमाल किया है। किसी का मुंह बंद करना कानून और संविधान की दृष्टि से अपराध की श्रेणी में आता है ।  अक्सर अपराधी ही इस तरिके का इस्तेमाल करते आए हैं किन्तु अब पुलिस ने भी अपराधियों के इस सिद्धहस्त औजार  को अपना लिया है । 

पुलिस की तरफदारी करने वाले कह सकते हैं कि  फांसीवाद का ये नया वैरिएंट गांधीवादी है। इसके तहत न गोली चली और न लाठी चली। किसी को शारीरिक चोट भी नहीं आयी और पुलिस का काम हो गया ,किन्तु क़ानून के नजरिये से देखा जाए तो पुलिस को किसी भी क़ानून के तहत ये अधिकार नहीं दिया गया है की वो किसी का मुंह बंद करे या उसे बोलने से रोके। प्रतिकार के लिए पीड़ित के पास नारेबाजी के अलावा और तरीके भी क्या है।  आप काले झंडे दिखा नहीं सकते, रास्ता रोक नहीं सकते और अब नारे भी नहीं लगा सकते। 

आपने अक्सर देखा,पढ़ा और सुना होगा कि  किसी का मुंह बंद तभी किया जाता है जब सामने वाले को बोलने वाले से कोई खतरा महसूस हो। अक्सर बलात्कारी इस तरीके का इसतमाल करते है।  लुटेरे भी चश्मदीदों का मुंह बंद कर लेते हैं। लेकन पुलिस ऐसा करती है ये पहली बार देखा और सुना है। मुमकिन है कि  पुलिस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में पंजाब सरकार ने प्रतिकार से निबटने के लिए ये नया तरीका शामिल कर लिया हो। नागरिक आजादी पर अपने तरीके का ये नया हमला है। ये आगे न फैले इसलिए इसका पुरजोर विरोध आवश्यक है। अव्वल तो पंजाब के मुख्यमंत्री को पंजाब पुलिस के इस घ्रणित कृत्य के लिए क्षमायाचना करना चाहिए और भविष्य के लिए भी पुलिस को आगाह करना चाहिए। चन्नी की पुलिस ने जो किया वैसा तो धुर सामंत कैप्टन अमरिन्दर सिंह की पुलिस ने भी कभी नहीं किया था। 

मुंह बंद करना एक अलोकतांत्रिक और आपराधिक कृत्य है ।  चोरी कि हिस्से   में से माल देकर चोर सिपाही का मुंह बंद करता है ।  शिकायत करने पर ज्यादती   करने वाला ससुर, बहू का मुंह बंद करता है,अपराधी पत्रकारों का मुंह बंद करते हैं ,ठेकेदार अफसरों को रिश्वत देकर उनका मुँहबन्द  करते हैं लेकिन पुलिस किसी का मुंह का बंद करे तो समझ में नहीं आता। पुलिस का काम तो मुँहबन्द करने वालों  के खिलाफ कार्रवाई करने का होता है। हिंदी व्याकरण की दृष्टि से मुंह बंद करना एक सकर्मक क्रिया है। अंग्रजी वाले अक्सर उत्तेजना में कहते हैं-'शट योर माउथ',लेकिन वे भी पंजाब पुलिस की तरह किसी कि मुंह पर जबरन अपना हाथ नहीं लगात। किसी कि मुंह पर हाथ रखना अपराध कि साथ ही अशिष्टता भी है ,किन्तु किसी भी राज्य की पुलिस से शिष्टाचार की अपेक्षा करना ही गलत है। पुलिस का सामान्य शिष्टाचार तक से कोई लेना-देना नहीं होता। 

मुंह बंद करना हिंदी जगत में एक मुहावरा है। लेखक आलोचक का मुंह बंद करता है ।  संसद में भी यही होता है और सड़क पर भी। संसद में मुंह खोलने पर मुँहबन्दी कि लिए सदस्यों को निलंबित कर दिया जाता है। मुँहबन्दी मौन का ही एक रूप है। स्वेच्छा से मुंह बंद करना गांधीवादी तरीका है प्रतिकार का किन्तु किसी का मुंह जबरन करना फांसीवादी तरीका है पुलिस या सरकार का। आधी सदी पहले देश आपातकाल कि रूप में मुँहबन्दी का दंश झेल चुका है। अब फिर से कांग्रेस कि ही राज्य में इसके अंकुरित होने से चिंतित होना स्वाभाविक है। देश में भाजपा कि पास ये हथियार पहले से है ,इसलिए सावधान रहना बहुत जरूरी है ।  

- राकेश अचल