सही मायने में कोरोना का डर है किसे..!

नेता के सत्ता की, डॉक्टर्स मरीजों की जान बचाने की और जनता दाल रोटी की जद्दोजहद में लगी है। भारत सच में विविधताओं का देश है कहीं लॉक डाउन, कहीं चुनाव, कहीं कुम्भ...और एकाध गांव में अभी भी कहीं न कहीं भागवत चल ही रही होगी। ज़िम्मेदार सत्ता बचाने में लगे हैं, डॉक्टर्स मरीजों की जान बचाने में और जनता दाल रोटी की जद्दोजहद में कपड़े का मास्क लगाकर सुपरमैन बनी घूम रही है। सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन और बेड की किल्लत,प्राइवेट हर आदमी के बस का नहीं है। दवाइयों से लेकर सेनिटाइजर तक महंगे हो चुके हैं। डॉक्टर मरीज़ के साथ साथ खुद की जान बचाने की चिंता में ग्रस्त हैं। हालांकि अब सरकार परिस्थितियों को भांपते हुए कुछ सचेत हो गई है और व्यवस्थाओं को बनाने में अग्रसर दिखाई देने लगी है। 

अस्पताल प्रबंधन, स्टाफ को छुट्टी पर चले जाने या नौकरी छोड़ देने के डर में अगली सुबह का इंतज़ार कर रहा होता है। प्राइवेट अस्पताल वाले इन सबके साथ मरीज़ की मौत पर होने वाले हंगामे और डॉक्टर्स की पिटाई के डर से बाउंसर्स को टीका लगवाने की जुगत में हैं। अस्पताल के मालिक(जो कि अमूमन डॉक्टर होते हैं) नेताओं और अफसरों के परिचितों को सही बेड दिलवाने और अस्पताल के बिल कम करवाने के तनाव से गुज़र रहे हैं। साथ साथ इस डर में हैं कि संक्रमण से संबंधित किसी नियम का उल्लंघन न हो जाये। पत्रकार को चिंता है कि लॉक डाउन लगा तो मालिक को विज्ञापन कैसे मिलेंगे फिर से छंटनी न हो जाये? घर चलाऊं, खबर लिखूं, नई नौकरी ढूँढू या टीका लगवा कर अस्पताल में खबर ढूंढने जाऊं?

तृतीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को चिंता है फिर से कंट्रोल रूम में न बिठा दें, सर्वे में ड्यूटी न लगा दें, बिटिया की शादी है कलेक्टर से छुट्टी कैसे सेंक्शन कराऊँ? सत्ताधारी नेताजी सोच रहे हैं.. लॉक डाउन लगाते हैं तो व्यापारी के बुरे और चुनाव नहीं करा पाएंगे, न लगाएं महामारी फैली फिर भी गैर जिम्मेदार कहलायेंगे। ऐसा करो डॉक्टर के डांट लेते हैं.. अफसरों को बदल देते हैं। इसकी आड़ में आंदोलन भी निपट जाएंगे और जनता मुद्दों से भटक कर जान और व्यापार बचाने के बारे में सोचने लगेगी। विपक्ष वाले नेताजी सोच रहे हैं कैसे सरकार को कटघरे में खड़ा करें? चलो बेड के नाम पर और अव्यवस्थाओं के नाम पर डॉक्टर्स को डांट आते हैं। किसान सोच रहा है कि फसल तो गई आंदोलन भी चला जा रहा है और हुआ कुछ नहीं.. लाला रामदेव सोच रहा होगा कि नाम तो मेरे जैसा है (रेमदेसिविर) पर पतंजलि का लेबल लगा कर कैसे बेचूं? इसी बीच बच्चे खुश हैं कि चलो फिर इस साल बिना पढ़े पास हो गए और फिर स्कूल नहीं जाना पड़ेगा। 

अंत में...मैं सोच रहा हूँ कि भारत में कोरोना दुबारा इतने तेजी से कैसे फैला? क्या लॉक डाउन वाकई समस्या का हल है? हम एक साल की गलतियों से अभी तक कुछ क्यों नहीं सीख पाए?  हमने पिछले 1 साल में कोविड से लड़ने के लिए क्या क्या नई तैयारियां कीं? कितने नए ICU तैयार कराये? कितने डॉक्टर्स/नर्सेस/ सपोर्टिव स्टाफ को इमरजेंसी की वेंटीलेटर चलाने की ट्रेनिंग दी? कितने सरकारी अस्पताओं में नए एनेस्थेसिया, पल्मोनरी मेडिसिन और जनरल मेडिसीन के डॉक्टर्स को भर्ती किया? कितनी सरकारी लैब्स का उन्नयन महामारी की गंभीरता के साथ किया? कितने ऑक्सीजन बनाने के संयंत्र लगाए? इमरजेंसी दवाएं, PPE किट और सैनिटाइजर बनाने वाली कंपनीज़ को सब्सीडी क्यों नहीं दी? कितने प्राइवेट अस्पताओं का उन्नयन PPP मोड पर किया? या प्राइवेट अस्पतालों के संचालन के बाबा आदम के ज़माने के रिश्वतखोरी के नियमों को शिथिल किया? काश जनता अंधभक्ति और चमचागिरी से ऊपर उठकर वास्तविक पड़ोसी, निर्दोष और आश्रित व्यक्ति के स्वास्थ्य और सामर्थ्य की चिंता करती...

ध्यान दीजिए - जनता कपड़े का मास्क, चुन्नी और साफी लपेट कर सोच रही है कि कर्ण के कवच कुंडल मिल गए! भैया, वायरस का आकार 9-15 नैनो मीटर है जो कपडे के दो धागों के बीच की जगह से कई गुना छोटा है। इसलिए केवल सर्जिकल 3 लेयर या N95 मास्क ही इसके लिए प्रतिरोधी हैं। अतः चुन्नी, साफी या कपड़े के मास्क को केवल कफ़न समझें... भारतीय वैक्सीन्स अभी भी ट्रायल फेज में हैं अतः उसे केवल मोरल बूस्टर समझ लें। केवल सही मास्क और डिस्टेंसिंग का ध्यान रखें। बाकी वही ब्रह्मवाक्य हमें तसल्ली देता हैं कि जो भगवान करेगा वो होगा और देश तो भगवान भरोसे चल ही रहा है।