ऑक्सिजन कहां खो गई…

ऑक्सिजन की कमी : वक्त का सबसे बड़ा संकट !

देशभर में इतने लोग प्राणवायु के लिए छटपटा रहे हों, ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया। लोग सिलिंडर लेकर लाइनों में खड़े हैं, अस्पतालों में कोहराम मचा है और डॉक्टर रो रहे हैं। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में जब एक दिन में 25 मरीजों की मौत की खबर आई तो लगा यह इंतिहा है। अस्पताल ने पहले ऑक्सिजन की कमी की ओर ध्यान दिलाया था, लेकिन अब उसने यह बताया है कि इन मरीजों की मौत ऑक्सिजन की कमी के कारण नहीं हुई। मामला जो भी हो, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अस्पतालों में ऑक्सिजन की कमी इस वक्त का सबसे बड़ा संकट है। कई अस्पताल नए मरीजों को एडमिट करना तो दूर, अपने यहां पहले से भर्ती पेशंट्स को भी कहीं और जाने की सलाह दे रहे हैं, जहां उन्हें ऑक्सिजन और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध हों। 

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी खबरें आ रही हैं। लाचारी की इस त्रासद तस्वीर के पीछे हैरत में डालने वाला तथ्य यह है कि यह स्थिति अप्रत्याशित नहीं है। बात का अंदाजा था और एक बार नहीं बल्कि दो बार यह बात शासन के संज्ञान में लाई गई थी कि देश में मेडिकल ऑक्सिजन की कमी हो सकती है। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक पहली बार अप्रैल 2020 में यानी ठीक एक साल पहले ऑफिसरों के एक एम्पावर्ड ग्रुप की बैठक में यह बात उठाई गई थी। उस बैठक में अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के अलावा नीति आयोग के सीईओ भी मौजूद थे, जो बैठक का नेतृत्व कर रहे थे।

 इसके बाद, स्वास्थ्य से जुड़े मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भी मेडिकल ऑक्सिजन की उपलब्धता को लेकर आगाह किया था और सरकार से कहा था कि वह ऑक्सिजन के पर्याप्त उत्पादन को प्रोत्साहित करे ताकि अस्पतालों में इसकी मांग के अनुरूप सप्लाई सुनिश्चित की जा सके। स्थायी समिति की यह रिपोर्ट अक्टूबर 2020 में राज्यसभा सभापति को पेश की गई। गौर करने की बात है कि ऑफिसरों के एम्पावर्ड ग्रुप की मीटिंग में जब यह बात कही गई थी, तब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू हुए एक सप्ताह ही हुआ था और पूरे देश में एक्टिव केसों की संख्या 2000 से कुछ ही ऊपर थी। जाहिर है, जरूरी इंतजाम करने के लिए सरकार के पास वक्त की कमी नहीं थी। बावजूद इसके, आज देश का यह हाल है और यह बताता है कि हमारा तंत्र किस कदर उदासीन हो चुका है।