इस मेहरबानी की सच्चाई के पीछे का डर...

चाह नहीं रहे फिर भी जबरदस्ती सौगात !

ग्वालियर। पिछले 19 दिनों से 3 नए कृषि कानूनों को लेकर दिल्ली बॉर्डर और उसके आसपास लगे अन्य प्रांतों के बॉर्डर पर बवाल मचा हुआ है। इस बवाल के पीछे का कारण है एक तरफ किसानों का नए कानून को लेकर डर और उससे कहीं ज्यादा सरकार की हठधर्मिता।किसान इन कानूनों को पूरी तरह से वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाये हुए हैं। वहीं सरकार इन कृषि कानूनों को वापस लेने के मूड में तो कतई दिखाई नहीं दे रही है सरकार का कहना है कि जिन बिंदुओं पर किसानों को आपत्ति है उन पर संशोधन करने के लिए हम तैयार हैं। लेकिन किसानों के मन में तो इन तीनों ही कृषि कानूनों को लेकर भय व्याप्त है और इस भय का कारण है।उद्योगपतियों और पूंजी पतियों का कृषि व्यवस्था में सीधी-सीधी घुसपैठ। सानू का कहना है कि उन्होंने तो सिर्फ एमएसपी कानून मांगा था लेकिन सरकार ने एमएसपी कानून के साथ साथ दो अन्य कानून और किसानों को मुफ्त में दे दिए। मुद्दा यही दो कानून है जिनसे किसान डरा हुआ है। 

इन कानूनों के अनुसार पूंजीपति व्यापारी प्राइवेट कृषि मंडियों से किसानों की खरीद-फरोख्त किसानों के चाहे गये मूल्य के उसकी  मनमर्जी के पर कर पाएगा या सीधे किसानों के खेत से आगामी फसल का एग्रीमेंट कर फसल की खरीदारी सीधे खेत से ही कर सकेगा।बालाजी सरकार का कहना है कि सरकारी मंडी अभी चलती रहेंगी उन्हें बंद नहीं किया जाएगा। किसान इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं। उनका कहना है की सरकार एमएसपी देने का दावा कर रही है लेकिन उन्हें कहीं एम एस भी नहीं मिल रही है बल्कि निर्धारित दामों से भी कम दामों पर अपनी फसल को बेचना पड़ रहा है । सरकार का यह भी कहना है कि किसी भी प्रांत का किसान किसी भी अन्य प्रांत में अपनी फसल बेचने के लिए स्वतंत्र होगा ऐसी कई तमाम सारी बातें सरकार के द्वारा इन नए कृषि कानूनों में किसानों को लुभाने के लिए कही गई हैं लेकिन फिर भी किसान डरा हुआ है। इन लोकलुभावन दावों बावजूद पिछले 19 दिनों से पंजाब हरियाणा राजस्थान मध्य प्रदेश आदि प्रदेशों के किसान इस कड़कड़ाती ठंड में अपना घर-बार और काम धंधा छोड़कर सड़कों पर आंदोलन कर रहा है। सोमवार को आंदोलन के 19 वे दिन किसानों ने 1 दिन का अनशन भी रखा। अनशन के कार्यक्रम में कुछ राजनीतिक पार्टियां भी बिना बुलाए किसानों के आंदोलन में शामिल हो गए जिसे लेकर सत्ताधारी पार्टी के नेताओं द्वारा इन पार्टियों को आड़े हाथों लिया।

अब सोचनीय पहलू यह है कि आखिर किसानों के डर का कारण क्या है इन कानूनों में ऐसा क्या निहित है जिससे किसान डरा हुआ है। इस पर किसानों का कहना है कि उनको डर है कि एग्रीमेंट करने पर व्यापारी सीधा-सीधा इनकी खेती किसानी में दखलअंदाजी करने लगेगा। किसानों का डर है कि व्यापारी फसल के समय तो एक बार को हमें मनचाहा फसल का मूल्य दे भी देगा, लेकिन सीजन निकलने के बाद वह इस फसल को अपने गोदामों में जमा कर लेगा और फिर मनचाही कीमत पर बाजार में बेचेगा। यानी कि इन कानूनों से जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा।इस जमाखोरी से सबसे ज्यादा मध्यमवर्ग प्रभावित होगा। कोटी खाद्यान्नों की कीमत उसी सरकार बनेगी जैसे वर्तमान समय में कभी आलू कभी प्याज कभी शक कर कभी तेल की कीमतें आसमान छूने लग जाती हैं। मध्यम वर्ग के साथ-साथ उनका अपना भी होगा शोषण होगा क्योंकि व्यापारी खाद्यान्नों को डिमांड और सप्लाई के बीच की खाई को बढ़ाकर मुनाफा कमाएगा। ऐसा नहीं है कि केवल मध्यमवर्गीय ही इससे प्रभावित होगा बल्कि किसान भी इससे प्रभावित होगा क्योंकि कहीं ना कहीं किसान भी इसी उपभोक्ता लाइन में आता है।किसान के पास वे संसाधन नहीं होते जिनसे कि वह अपने खाद्यान्न को अपने पास ज्यादा समय के लिए स्टोर करके रख सके, उसे भी बाजार पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

किसानों का कहना है कि व्यापारी हमसे ही खरीद कर जमाखोरी करने के बाद, हमें ही महंगे दामों पर  बेचेगा। यानी कि फिर से वही जमीदारी प्रथा वाला समय हमें एक बार फिर देखने को मिलेगा इसलिए हम नहीं चाहते कि यह कानून लागू हो।  किसानों का एक डर यह भी है कि व्यापारी के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया के लिए एसडीएम कोर्ट बहुत छोटी इकाई है। एसडीएम इन पूंजी पतियों के आगे बहुत छोटा अधिकारी होता है इसलिए उन्हें ठीक से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है।  ऐसे ही अनेक शंकाओं के चलते उन्होंने सरकार से मांग करते हुए हमें बताया कि सरकार इन कानूनों को बगैर किसी ना नुकर के वापस ले लेती है तो हम तुरंत ही अपना आंदोलन समाप्त करते हुए सड़कों को खाली कर देंगे। किसानों के द्वारा किए जा रहे इस शांतिपूर्ण आंदोलन मैं कुछ राजनीतिक पार्टियां कुछ असामाजिक तत्त्वों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी संकेत मिल रहे हैं। इससे इस आंदोलन की सफलता पर संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं। क्योंकि यदि इस आंदोलन को राजनीतिक पार्टियों ने हाईजैक कर लिया तो फिर किसानों की सरकार क्यों कर कोई बात सुनेगी।

हालांकि सरकार किसानों से लगातार बातचीत करती आ रही है और आगे भी बातचीत के ऑफर किसानों को दे रही है अब देखना यह होगा कि इस किसान आंदोलन की अगुवाई करने वाले किसान संगठन इन राजनीतिक पार्टियों और अवांछित तत्वों को या उनके प्रतिनिधियों को कैसे आंदोलन स्थल से दूर रख पाने में कामयाब होते हैं। सरकार को भी किसानों की मांगो और उनके शंकाओं को ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय शीघ्र लेना चाहिए। आगे मौसम और भी खराब होने वाला है जिससे किसानों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा अभी वैसे भी करोना कॉल चल रहा है। राजनीतिक पार्टियों और अवांछित तत्वों को भी अपनी आकांक्षाएं पूरी करने का इस आंदोलन के बहाने मौका ढूंढने का अवसर मिलेगा।सरकार पहल करते हुए किसी भी तरह इस आंदोलन को समाप्त करें।