जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बजाए बचाने की कोशिश…

प्रदेश में 250 करोड़ रुपये तक पहुंचा चावल घोटाला

भोपाल। चावल घोटाला माफिया और अधिकारियों की मिलीभगत से 250 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। राजनेताओं के संरक्षण में इस गठजोड़ ने घटिया चावल सरकारी गोदामों तक पहुंचाया। जांच में यह उजागर हो चुका है। अब जिम्मेदारों पर कार्रवाई करने की जगह चावल को वापस मिलरों को लौटाया जा रहा है। यही वजह है कि ईओडब्ल्यू ने अब तक जांच में कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की। सर्वाधिक 47 करोड़ रुपये मूल्य का घटिया चावल बालाघाट में पाया गया है। दरअसल, चावल की गुणवत्ता जांच का कोई पुख्ता तंत्र मध्य प्रदेश में नहीं है। राज्य का नागरिक आपूर्ति निगम अपने और भारतीय खाद्य निगम के सेवानिवृत्त अधिकारियों की सेवाएं लेकर काम चला रहा है, जो माफिया के गठजोड़ का आसानी से हिस्सा बन जाते हैं। 

यही वजह है कि केंद्र सरकार की जांच का हल्ला मचने के बाद 73 हजार 540 टन चावल मिलर्स को वापस लौटाया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक उच्च स्तरीय जांच में सामने आया कि चावल की गुणवत्ता को लेकर चलने वाला खेल बिना अधिकारी, मिलर और गोदाम के कर्मचारियों की मिलीभगत के संभव नहीं है। दरअसल, नियमों में चार स्तर पर जांच का प्रविधान है पर इसकी अनदेखी जानबूझकर की जाती है। धान खरीद के समय, मिलर को मिलिंग के लिए देते समय मिलिंग के बाद अधिकारियों से नमूना जांच और सबसे अंत में गोदाम में चावल जमा कराते समय गुणवत्ता की जांच होती है। 

इस व्यवस्था के बाद भी प्रदेश के 22 जिलों में 73 हजार 540 टन निम्न गुणवत्ता का चावल गोदामों में पहुंच गया, जो 250 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। एक क्विंटल चावल पर 31 सौ रुपये का खर्च सरकार को एक क्विंटल चावल पर करीब 3100 रुपये का खर्च आता है। इस हिसाब से देखें तो यह खेल बड़ा है। केंद्र सरकार द्वारा बालाघाट और मंडला में कराई गई जांच के बाद राज्य सरकार ने इस निम्न गुणवत्ता के चावल को मिलर्स को वापस लौटाने का फैसला किया है, लेकिन अभी तक यह चावल गोदामों में ही रखा है। जांच चलने के कारण अभी पूरी प्रक्रिया रुकी हुई है। जैसे ही जांच के निष्कर्ष सामने आएंगे, उसके बाद केंद्र सरकार को प्रतिवेदन भेजकर अगला निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, नागरिक आपूर्ति निगम इस कोशिश में लगा है कि राशन में उस चावल को बांटना शुरु करवा दिया जाए, जो गुणवत्तायुक्त है।