कुदरत का कोटा

आज का दिन, यानी 24 अगस्त इस साल का अर्थ ओवरशूट डे है। ‘अर्थ ओवरशूट डे’ बोले तो साल का वह दिन जब हम धरती द्वारा पूरे साल के लिए उपलब्ध कराए गए समस्त संसाधनों का उपभोग कर चुके होते हैं। साल भर के लिए उपलब्ध कराए गए संसाधन से मतलब संसाधनों की उस मात्रा से होता है जिसका पृथ्वी एक साल में पुनर्सृजन कर सकती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कल से इस पूरे साल मानव समाज जितने भी ईंधन, पेयजल, कपड़ा, अनाज, मांस-मछली-अंडा वगैरह का उपभोग करेगा, उन्हें अपनी सहज गति में उपजाने की क्षमता पृथ्वी में नहीं है। ऐसे में इन्हें इस ग्रह के संचित कोष से हासिल किया जाएगा, जो अगले दस-बीस या सौ साल में खत्म हो जाएगा। यह ऐसे ही है जैसे पूरे महीने के लिए निर्धारित अपना बजट हम 20 दिन में ही उड़ा डालें। यह कुछ समय तक मैनेज हो सकता है, लेकिन हमेशा नहीं चल सकता। अर्थ ओवरशूट डे हर साल अलग-अलग तारीख को आता है। इसे निर्धारित करने का काम अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क से जुड़े रिसर्चर्स करते हैं। 

दिलचस्प बात यह है कि इस साल यह दिन पिछले साल के मुकाबले 24 दिन देर से आया है। पिछले साल यह 29 जुलाई को ही आ गया था। 1970 के दशक से ही अर्थ ओवरशूट डे साल-दर-साल पीछे की ओर ही खिसकता आ रहा है। इस साल इसके आगे बढ़ने का जो दुर्लभ संयोग दिख रहा है, वह भी कोई राहत नहीं दे रहा। वजह यह है कि इसके पीछे कोरोना वायरस से उपजी महामारी है। यानी यह मानव समाज के विवेकशील प्रयासों का परिणाम नहीं बल्कि कुदरत के एक विनाशकारी कदम का नतीजा है। वायरस जनित महामारी और उससे बचने के लिए लॉकडाउन जैसे मजबूरी में अपनाए गए उपाय से मनुष्य समाज पर मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़े। 

इनके साइड इफेक्ट के रूप में अगर थोड़ा फायदा यह हुआ कि प्रकृति के संसाधनों की खपत में कुछ कमी आ गई तो इस पर खुश नहीं हुआ जा सकता। कारण यह कि एक तो इसकी बेहिसाब कीमत चुकानी पड़ी, दूसरे यह कोई स्थायी उपलब्धि नहीं है। जैसे ही कोरोना का प्रकोप कम होगा और जीवन अपनी पुरानी लय में लौटेगा, वैसे ही प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध खपत फिर शुरू हो जाएगी। साफ है कि धरती के संसाधनों को बचाने का काम कोविड-19 जैसी प्राकृतिक आपदाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हां, हम इससे सबक जरूर ले सकते हैं। दुनिया भर की सरकारों में बैठे नीति नियंताओं ने कोरोना के दबाव में आर्थिक विकास की लगातार तेज होती गाड़ी पर इमरजेंसी ब्रेक लगाया, जिसके झटके ने सब उथल-पुथल कर दिया। सवाल है कि स्पीड कम करने का यही काम सोचे-समझे ढंग से क्यों नहीं हो सकता? कुछ इस तरह कि पृथ्वी का भविष्य सुरक्षित रहे और किसी को बड़ा झटका भी न लगे।