हाईवे केवल "विकास" की चमकदार तस्वीर नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है...
हाईवे पर गाय और टोल,वाहन चालकों के लिए बने मुसीबत !
देश की सड़कों पर दौड़ते हाईवे आज विकास की पहचान माने जाते हैं। टोल टैक्स की ऊँची वसूली से सरकार और संबंधित अथॉरिटीज़ यह दावा करती हैं कि यात्रियों को "विश्वस्तरीय सुविधाएँ" मिल रही हैं।
हाईवे केवल "विकास" की चमकदार तस्वीर नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। प्रशासन और सरकार यदि केवल टोल वसूली पर ध्यान देंगे और सुरक्षा की अनदेखी करेंगे, तो हर दुर्घटना उनके खाते में जाएगी। सड़कें तभी "विश्वस्तरीय" कहलाएँगी जब वहाँ वाहन चालक निश्चिंत होकर चलें और कोई गाय सड़क पर मरने के लिए मजबूर न हो।
वास्तविकता ज़मीनी है—जहाँ हर पचास कदम की दूरी पर पर गायें और आवारा पशुओं का झुंड सड़क पर जीवन और मृत्यु का खेल खेलते नज़र आते हैं। सवाल यह है कि जब वाहन चालक और गाय, दोनों की जान खतरे में है, तो टोल टैक्स का असली उपयोग कहाँ हो रहा है?
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब टोल टैक्स के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है, तो यात्रियों को सुरक्षा क्यों नहीं दी जा रही? प्रशासन का दायित्व सिर्फ पैसा लेना नहीं, बल्कि सुरक्षित यात्रा और दुर्घटना-रहित सड़कें देना भी है। हाईवे पर फेंसिंग की व्यवस्था क्यों नहीं है?
जिस क्षेत्र से यह हाईवे निकल रहा है,क्या वहां के स्थानीय प्रशासन ने गायों के लिए आश्रय स्थलों की जिम्मेदारी ठीक से निभाई है ? यदि जवाब “नहीं” है, तो यह साफ प्रशासनिक लापरवाही है। टोल से होने वाली कमाई का एक हिस्सा सड़क सुरक्षा और पशु प्रबंधन पर खर्च होना चाहिए। अन्यथा हर दुर्घटना का जिम्मा प्रशासन और हाईवे अथॉरिटीज़ पर ही जाएगा।
समस्या की जड़...
टोल टैक्स केवल वसूली का माध्यम बन गया है। सड़क किनारे बैरियर, पशु रोकने की व्यवस्था, या सुरक्षित आश्रय स्थलों की योजना कहीं दिखाई नहीं देती। नतीजा यह है कि हर साल सैकड़ों सड़क दुर्घटनाएँ केवल इसलिए होती हैं क्योंकि किसी गाय या बछड़े ने अचानक हाईवे पर छलांग लगा दी। यह न सिर्फ वाहन चालकों के लिए खतरा है बल्कि पशुओं की भी असमय मौत का कारण है।
प्रशासन की जिम्मेदारी...
हाईवे अथॉरिटीज़ का दायित्व केवल टोल लेना नहीं, बल्कि यात्रियों को सुरक्षित और व्यवस्थित यात्रा प्रदान करना भी है।
- क्या पशुओं को रोकने के लिए पर्याप्त फेंसिंग की गई?
- क्या रात में हाईवे पर दृश्यता बढ़ाने के लिए विशेष संकेतक लगाए गए?
- क्या स्थानीय निकायों के साथ मिलकर पशुओं के लिए वैकल्पिक आश्रय स्थल बनाए गए?
- अगर इन सवालों का जवाब "नहीं" है, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही है।
समाधान की दिशा...
- 1. फेंसिंग और बैरिकेडिंग: हर हाईवे पर पशु प्रवेश रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था अनिवार्य हो।
- 2. सुरक्षित आश्रय: स्थानीय नगर निकायों और राज्य सरकार को मिलकर गौशालाएँ और आश्रय स्थल सक्रिय रूप से चलाने होंगे।
- 3. तकनीकी उपाय: सीसीटीवी मॉनिटरिंग और सेंसर आधारित अलर्ट सिस्टम का इस्तेमाल पशुओं की गतिविधियों पर निगरानी के लिए किया जा सकता है।
- 4. फंड का पारदर्शी उपयोग: टोल से होने वाली वसूली का एक निश्चित हिस्सा सड़क सुरक्षा और पशु प्रबंधन पर खर्च होना चाहिए।
“टोल की गाड़ी रोज़ निकलती होगी,सुरक्षा की गाड़ी कब आएगी?”
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