माॅ - बेटी के जीवन का एक संघर्ष ...
एक ’लाड़ली’’ माॅ बोलने से माॅ सुनने तक का सफर !
हमारी संस्कृति हमें महिलाओं की इज्जत करना सिखाती है हमारी पढ़ाई भी स्त्रियों का सम्मान करना सिखाती है। अगर आंकड़ों की बात करें तो हमारे देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिये देश में अनेक कानून और योजनाए बनायी गयी लेकिन प्रश्न यह है, कि हमारे देश में महिलाओं की स्थिति में कितना सुधार हुआ है। महिलाओं का संघर्ष माॅ की कोख से ही शुरू हो जाता है। माॅ नौ महीने तक पल-पल अपने खून अपनी आत्मा से अपने भीतर पलते जीवन को सीचती है और जैसे ही पता चलता है, कि आने वाला बच्चा लड़का नहीं लड़की है तभी से उसके जीवन का संघर्ष शुरू हो जाता है। एक संघर्ष बेटी के जीवन का और दूसरा संघर्ष उस माॅ का जो उस बेटी को धरती पर लेकर के आयी है। उसकी मनोदशा को कौन समझ पाता है कि माॅ बनने की खुशी बेटी के आने की खुशी क्या है।
हमारी संस्कृति में कन्याओं को देवी के रूप में पूजा जाता है, लेकिन हमारे देश की एक ये भी सच्चाई है, कि कुछ घरों में कन्या का जन्त माथे पर चिंता की लकीरें खीचती है होठों पर मुस्कुराहट नहीं। महिलायें पुरूष दोनों ही समाज के एक समान अंग हैं, लेकिन महिलाओं के जीवन में बहुत संघर्ष होता है। पुरूष तो टूट जाते हैं कुछ नशा करने लगते हैं तो कुछ आत्महत्या कर लेते हैं पर औरत जब संघर्ष करने पर आती हैं तो उसको कोई बाधा नहीं रोक पाती।
महिलाओं की भूमिका - महिलाओं को जीवन में अनेक रूपों मंे देखा जाता है कभी वह माॅ की भूमिका निभाती हैं तो कभी बहन की, कभी बेटी की, कभी पत्नी की और कभी बहु की बहुत सारे रूपों में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। माॅ बच्चों की जिंदगी का वो भाग है जिसके बिना एक परिवार और बच्चें अधूरे है क्योंकि अगर माॅ नहीं होती तो हमारा इस संसार मंे जन्म कैसे होता और माॅ वह होती है हर सुख-दुख मेें अपने बच्चों के साथ खड़ी होती है। घर में बेटी जन्म लेती है तो समझा जाता है, कि घर में लक्ष्मी आयी हो। उस घर में बेटी के आगमन से खुशियां आ जाती है और फिर वह बेटी अपने घर-घर के साथ-साथ अपने देश का नाम रोशन करती है। वह अपने भाई को जरूरत पड़ने पर सदैव सहायता करती है और बहन का फर्ज निभाती है। बेटी जब शादी कर बहु बन के जब अपने घर को छोड़कर ससुराल जाती है तो उस घर में सबसे अनजान होते हुये भी उस घर को अपना घर समझती है और अपने पति तथा परिवार को सुखी रखकर के घर को स्वर्ग बनाने की हमेशा केशिश करती रहती है। यही बहु एक दिन किसी की सास बनती है और अपने अनुभव से परिवार में एकता बनाये रखती है।
महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण-हमारे समाज में महिलाओं को इज्जत और सम्मान प्राप्त नहीं हो पाता है माॅ का सम्मान नहीं किया जाता है और मुसीबत समझ के वृद्धाआश्रम में छोड़ दिया जाता है, बहन को पराई समझते हैं, बहु को पैर की जूती और बेटी को एक मुसीबत। ऐसा कब तक चलेगा हम महिलाओं को सम्मान और इज्जत कब देंगे हमारी युवा पीढ़ी को यह समझना होगा और हमारे बुजुर्गों को भी समझना होगा कि महिलाओं की हमारी जिंदगी में क्या महत्तवा है। आज कल ऐसी घटनायें बहुत तेजी से बढ़ रही है जिनमें किसी लड़की के ऊपर तेजाब फेक दिया या कभी बलात्कार की खबरे सुनायी देती है जैसे कभी छोटी से बच्ची के साथ कभी जवान लड़की के साथ और कभी बूढ़ी महिला के साथ। देश के नागरिक कब समझेंगे, कि उनके परिवार पर क्या बीतेगी या उस बच्ची पर क्या बीतेगी वह इस समाज में किसे और कैसे मुॅह दिखायेगी। हम सभी को अब समझना होगा कि हमारी जिंदगी में उनकी क्या अहमियत है उनको पूर्ण सम्मान कैसे दें। हमारी और आप सबकी आवाज ही एक दिन महिलाओं को सर उठा के जीने का सम्मान दिला सकती है तभी हम एक विकसित राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं।
आत्मनिर्भर होती महिलायें-सम्पूर्ण विश्व में 8 मार्च को मनाया जाने वाला महिला दिवस एवं महिला सप्ताह केवल कुछ महिलाओं और कुछ कार्यक्रमों के आयोजन के साथ हर साल मनाया जाता है, लेकिन इस प्रकार के आयोजनों का खोखलापन तब तक दूर नहीं होगा जब तक देश की उस आखिरी महिला के सम्मान उसके स्वाभिमान की रक्षा के लिये उसे किसी कानून, सरकार, समाज या पुरूष की आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्थात वह सही मायनों में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो जायेगी। आज हमारे समाज में यह अत्यंत दुर्भाग्य विषय है, कि कुछ महिलाओं ने स्वयं अपनी आजादी के अर्थ को केवल कुछ भी पहनने से लेकर देर रात तक कही भी कभी भी कैसे भी घूमने-फिरने की आजादी तक सीमित कर दिया है। काश हम सब ये समझ पाये कि खाने-पीने, पहनने या फिर न पहनने की आजादी तो एक जानवर के पास भी होती है। लेकिन आजादी वो है जो खुलकर सोच पाने की आजादी हो वो सोच जो उसे उसके परिवार और समाज को आगे लेकर जाये।
महिलाओं का योगदान-हम सभी के जीवन में महिलाओं का योगदान सदैव श्रेष्ठ रहा है। जन्म से लेकर के मृत्यु तक उनके द्वारा हर एक रिश्ते के लिये जिस तरह से अपनी जिम्मेदारी को निभाया जाता है उसके लिये कोेई भी शब्द नहीं बना है। उनके जीवन में संघर्ष हर वक्त बना रहता है। अपनी भावनाओं को कुर्वान कर अपनों के लिये जीने की जो क्षमता उनके अंदर होती है उसकी कल्पना करना भी संभव नहीं है। इसलिये हम सभी का यह महत्वपूर्ण कर्तव्य बन जाता है कि हम उनकी भावनाओं का सम्मान करें तथा उनकों इज्जत देने के साथ-साथ उनके सपनों को पूरा करने में सहायोग प्रदान करें ताकि वे अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर सकें। कोविड की बजह से अनेक ऐसे परिवार हैं जिनमें परिवार के मुखिया का साया सिर से उठ गया हैं ऐसे में घर की महिलाओं के द्वारा जिस तरह से परिवार चलाने के लिये मजदूरी, सब्जी का ठेला लगाकर सब्जी बेचना आदि ऐसे कार्य है जो किये गये। उनके द्वारा जो संधर्ष किया गया वह अदभुत है। कोविड के समय उन्होंने यह साबित किया कि देश में माॅ बेटी से बढ़कर और कोई योद्धा नहीं है।
नारी सम्मान- इस पृथ्वी पर ऐसा कोई जीव नहीं जिसका संघर्ष जीवन से पहले यानि जन्म लेने से पहले ही आरंभ हो जाता है या ऐसा कहा जाये कि जन्म के लिये संघर्ष शुरू हो जाता है। इससे अधिक और क्या कहना है हम सभी जानते हैं, कि नारी ने अपना वर्चस्क कायम कर विश्व में तो क्या अंतरिक्ष में भी अंकित कर दिया है। भविष्य में भी उम्मीद की जा सकती है कि नारी के द्वारा देश निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता रहेगा। माना पुरूष बलशाली है पर जीतती हमेशा नारी ही है। जैसे सांवरिया के छप्पन भोग पर सिर्फ एक तुलसी भारी है। इस प्रकार हमने देखा है, कि नारी जीवन तो जन्म के पहले से लेकर मृत्यु तक चुनौतियों से ही भरा हुआ है। इस स्थिति में हम सब उनकी भावनाओं को ध्यान में रखकर उनको सम्मान, इज्जत व साथ दें ताकि वे भयमुक्त होकर अपने सपनों का संसार बना सके l
-कृष्णकांत शर्मा










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