बंद रखो या खोलो ,आपकी मर्जी ..

हमेशा से है जनता को अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रतिकार करने का अधिकार !


जनादेश से बनीं सरकारें जब जनादेश की अनदेखी करने लेगें तो जनता को अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रतिकार करने का अधिकार हमेशा से है। ये अधिकार प्रकति प्रदत्त तो है ही साथ ही संविधान ने भी इस अधिकार को संरक्षण दिया है। सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ सेंट्रल ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मोर्चे ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ आज और कल देशव्यापी बंद का आह्वान किया है। बंद की वजह से दो दिन बैंकों का कामकाज भी ठप्प रह सकता है क्योंकि अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने बंद को अपना समर्थन दे दिया है।  ट्रेड यूनियन सरकार की कुछ नीतियों को तुरंत बदले जाने की मांग कर रही हैं। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि सरकार श्रम संहिता को खत्म करे, किसी भी तरह के प्राइवेटाइजेशन को तुरंत रोके, राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन यानी (एनएमपी)  को खत्म करे और मनरेगा के तहत मजदूरी आवंटन को बढ़ाए और ठेका श्रमिकों को नियमित करे। आप सवाल कर सकते हैं की क्या ट्रेड यूनियनों की तमाम मांगे नाजायज हैं ?तो आपको जबाब मिलेगा ' नहीं '। ट्रेड यूनियन एकदम सही मांगें कर रही है क्योंकि जिन मुद्दों को बंद के जरिये रेखांकित करने की मांग की जा रही है वे बेहद जरूरी मुद्दे हैं। जाहिर है की कोई भी सरकार इस तरह के बंद को राष्ट्र विरोधी और विकास में बाधक कहेगी। कहती ही है लेकिन लोकतंत्र में अपनी मांगों को लेकर बंद करना कोई नई बात नहीं है। सबको पता है कि बंद की वजह से देश को काफी नुक्सान होता है किन्तु इस नुक्सान के लिए ट्रेड यूनियन नहीं बल्कि सरकार जिम्मेदार है। सरकार यदि समय रहते इन तमाम विषयों पर बतचीत कर ले तो बंद की नौबत ही न आये। 

दुर्भाग्य है लोकतंत्र का की जनादेश से चुनी सरकारें अक्सर जन विरोधी हो जातीं है। वे जनता की ही नहीं सुनतीं। अगर सुनतीं तो देश में दुनिया का सबसे लंबा किसान आंदोलन न होता। ये बात अलग है की किसान आंदोलन का सरकार की सेहत पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा,इसलिए सरकार की हिम्मत और बढ़ गयी जन विरोधी नीतियां बनाने और उन पर अमल करने की। जनता का प्रतिकार जब भितरघात का शिकार होता है तब यही होता है। पहले भी होता था और आज भी हो रहा है। दल बदलने से सरकार का चरित्र कभी नहीं बदलता ,यदि बदलता होता तो बीते सात साल में न सिर्फ देश में राम राज आ गया होता बल्कि अच्छे दिन भी लौटकर आ गए होते ,जो आजतक नहीं आये। जन विरोधी नीतियों के खिलाफ आज और कल के बंद में देश की 130  करोड़ आबादी में से कोई २० करोड़ आबादी हिस्सा लेगी ,शेष 80  करोड़ आबादी अगले कुछ महीने तक मुफ्त  का राशन पाने की वजह से इस तरह के आंदोलनों का हिस्सा नहीं बनेगी। बची 30  करोड़ आबादी उम्रदराज बुजुर्गों की है जो अब प्रतिकार के लायक नहीं रह गयी है। इस आबादी को सरकार और समाज की दया और अनुकम्पा की जरूरत है। 

दुर्भाग्य ये है कि सरकार इस लगातार बूढी होती हो रही आबादी से भी अतीत में मिलने वाली तमाम तरह की रियायतें छीनने पर आमादा है। ऑल इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस की महासचिव अमरजीत कौर के मुताबिक देशभर के करीब 20 करोड़ कामगार और मजूदर औपचारिक-अनऔपचारिक तौर पर बंद में शामिल होंगे। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ दल से संबंधित भारतीय मजदूर संघ इस बंद के खिलाफ है। भारतीय मजदूर संघ का कहना है कि ये हड़ताल राजनीति से प्रेरित है और इसका उद्देश्य राजनीतिक लाभ कमाना है इसलिए वो इस बंद में शामिल नही होंगे।भामस के इस बंद में शामिल  न होने  से कोई ख़ास  फर्क  पड़ने  वाला  नहीं है ,क्योंकि इस संघ की कुल सदस्य सांख्या अभी भी 60 -62  लाख से ज्यादा नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं  सेवक  संघ के अनुसांगिक  संगठन  के रूप में काम करने वाले भैंस की ताकत सीमित है ,ये संगठन सरकार के इशारे पर आंदोलन करता है। दो दिन के बंद में रोड़वेज, ट्रांसपोर्ट और बिजली विभाग के कर्मचारी भी बंद में शामिल होंगे। इसके अलावा बैंकिंग और इंशोरेंस कंपनियां भी बंद में शामिल रहेंगी। ट्रेड यूनियन ने कोयला, तेल, पोस्टल, आयकर और टैक्स जैसी यूनियनों से भी बंद का समर्थन करने की अपील की है। इनके अलावा रेलवे और डिफेंस से जुड़ी यूनियन भी दो दिन देश में जगह जगह हड़ताल और विरोध प्रदर्शन करेंगी। 

बैंकिंग सेक्टर में एसबीआई ने बयान जारी कर कहा है कि बंद के चलते बैंकिंग सेवाएं प्रभावित हो सकती है।पंजाब नेशनल बैंक और केनरा बैंक ने भी हड़ताल की वजह से सामान्य कामकाज के प्रभावित होने की आशंका जताई है। किसी देश में ब्नद होने का मतलब है की उस देश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है,यदि ठीक चल रहा होता तो भारत में इस तरह के बंद न किये जाते। मुझे नहीं लगता  की इस दो दिन के बंद के बाद सरकार की कुम्भकर्णी नींद टूटेगी। जो सरकार एक साल से अधिक लम्बे चले किसान आंदोलन के बाद भी नहीं सुधरी ,उस सरकार से शर्म कानूनों  में तब्दीली  या निजीकरण    से पीछे  हटने  की उम्मीद  कैसे  कर सकते  हैं ?सरकार ठेका मजदूरों को आजन्म ठेका मजदूर ही बनाये रखना चाहती है। कांग्रेस  के शासन में शुरू की गयी मनरेगा आज की सरकार को फूटी आँख नहीं सुहा रही ,उसके  तहत  मजदूरी  आखिर  कैसे बढ़ा  सकती  है ?जबकि ऐसा  करना समय की मांग है। सरकार पर दबाब  बनाने के लिए जनता को भी ट्रेड यूनियनों के साथ खड़ा रहना चाहिए ,अन्यथा आने  वाले कल में जनता का जीवन  भी दूभर  हो जाएगा। पेट्रोल ,डीजल और रसोई गैस पर लगातार मूलवृद्धि का सीधा  असर जनता पर ही पड़ने वाला है। दुर्भाग्य ये है कि दुनिया की कोई भी सरकार अपने  आपको जन विरोधी नहीं मानती जबकि होती है। अब आपके  ऊपर  है कि आप इन दो दिनों  के आंदोलन में भाग  लेते  हैं या नहीं ?सरकार का विरोध  करने से आपकी सरकार के प्रति भक्ति पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। आप भक्त  रहकर भी इस आंदोलन  में शामिल रह सकते हैं। 

- राकेश अचल